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देश को ग्लोबल प्राइस लिस्ट की जरूरत


🗒 शनिवार, जुलाई 01 2017
🖋 विक्रम सिंह यादव, प्रधान संपादक

आदरणीय प्रधान मंत्री जी,

देश को ग्लोबल प्राइस लिस्ट की जरूरत

मै भारत का एक जिम्मेदार नागरिक हूँ और उस जिम्मेदारी को समझते हुए आप से एक निवेदन करना चाहता हूँ ,

अब जबकि देश में जी एस टी लागू हो गया है, इस काम के लिए आप को और पूरे देश को बधाई देना चाहता हूँ और आप के एस साहसी कदम का स्वागत करता हूँ ,
तब आप के एक और सराहनीय कदम की जरूरत है जिससे देश में बढती हुयी महगाई को सायद रोका जा सकता है,
अब वक्त आ गया है की पूरे देश में एक ग्लोबल प्राइस लिस्ट जारी की जाय और किसी भी एक वस्तु/सामान की कीमत देश के किसी भी कोने में किसी भी दुकान में एक ही हो,
इसके लिए जरूरत है की पूरे देश की उत्पादन इकाईयो को पंजीकृत किया जाय और उनके द्वारा निर्मित सामान का दाम जाच और परख के बाद सरकार द्वारा तय किया जाय, सरकार यह तय करे कि किस गुणवत्ता के सामान की कीमत क्या होगी और वह सामान बाजार में किस भाव में बेंची जा सकेगी,
जैसा कि आप जान पा रहे होंगे की उत्पादन की लागत और खुदरा मूल्य में कितना फर्क होता है पूरे देश को जैसे लूटा जा रहा है, अधिकतम विक्रय मूल्य उत्पादन की लागत का गयी गुना होता है, जिसके कारन देश वासियों को बहोत अधिक मूल्य चुकाना पड़ता है.
बिना पंजीकरण के कोई भी उत्पादन न कर सके चाहे वह छोटी उत्पादन इकाई हो या बड़ी,
छोटे से उदाहरणसे आप यह जान पाएंगे की किस प्रकार आम जनता को धोखा दिया जा रहा है ,
आप पीने के पानी का ही उदहारण ले सकते है जहाँ पर ब्रांडेड मिनरल वाटर 20 रूपये मूल्य का है वही पर सामान्य आरओ वाटर 20रूपये का मिल रहा है, ब्रांडेड पानी बेचने पर दूकानदार को 1रूपये से लेकर 3 रूपये तक बचता है जबकि वही पर सामान्य आरओ वाटर में वह 10 रूपये से लेकर 15 रूपये कमाता है,
सरकार द्वारा किसी भी उत्पादन का मूल्य तय नहीं किया जाता अधिकतम खुदरा मूल्य उत्पादन इकाई ही तय करती है और जो मन आया जितना मन आया लिख देते है,
दवा का उदहारण लेकर भी आप समझ सकते है कि एक ही फार्मूला अलग अलग कंपनिया अलग अलग दाम पर बेचती है इसका क्या कारन हो सकता है,अगर फार्मूला एक है तो दाम अलग क्यों है अगर दवा का प्रभाव कम है तो उसे बेचने की इजाजत क्यों दी गयी है यह सब शोध का विषय है,
पथोलोजी का उदहारण सायद यहाँ सही होगा , एक टेस्ट का दाम हर पथालोजी में अलग अलग है ऐसा क्यों,
मिठाई वाले का भी उदहारण देख लेते है जो कि सामान्यतः लूटने की सबसे बड़ी इकाई है, खोये की बनी मिठाई जिसमे अधिकतम चीनी की मात्रा 40 प्रतिशत हो सकती है का दाम 200 रूपये से लेकर 800 तक देख सकते है एक ही दूध के खोये में इतना अंतर कैसे हो सकता है चीनी तो अधिकतम 40 से 50 रूपये किलो ही है,

ऐसा आप को सामान्यतः सब जगह देखने को मिल सकता है, सरकार द्वारा बिना ठोस कदम उठाये कुछ नहीं हो सकता.
जबतक हर उत्पादन का एक दाम निश्चित नहीं होगा देश में ऐसे ही लूट मची रहेगी और आम जनता को दिन प्रतिदिन लूटा जाता रहेगा.

आप से सराहनीय कदम की अपेक्षा है, इतंजार रहेगा ....

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