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झाँसी-कानपुर ट्रैक पर एक के बाद एक ओवरलोड मालगाड़ियों की पासिंग, मरम्मत के लिए कम ब्लॉक जैसे बिन्दु चिन्तनीय


🗒 मंगलवार, जनवरी 31 2017
🖋 अमित कुमार, सहसंपादक बुंदेलखंड

अमित शुक्ला झांसी


    पुखरायाँ व रूरा रेल हादसों की जाँच के लिए आये दक्षिण कोरियाई एक्सप‌र्ट्स ट्रैक की सुरक्षा को लेकर चेता गये हैं। यदि ट्रेनों के परिचालन पर निगाह डालें, तो उनके द्वारा बतायी गयी बातों में दम ऩजर आता है। झाँसी-कानपुर ट्रैक पर एक के बाद एक ओवरलोड मालगाड़ियों की पासिंग, मरम्मत के लिए कम ब्लॉक जैसे बिन्दु वाकई चिन्तनीय हैं।

    रेल हादसों के कारण जानने के लिए रेल मन्त्री सुरेश प्रभु ने कई देशों के एक्सप‌र्ट्स से सहयोग माँगा था। हाल ही में आये दक्षिण कोरियाई विशेषज्ञों ने ट्रैक की दुर्दशा के लिए मालगाड़ियों की ओवरलोडिंग को ़िजम्मेदार ठहराया है। इसके अलावा मालगाड़ियों की गति भी इसमें एक अहम कारण के रूप में पेश की गयी। यदि झाँसी-कानपुर रेलमार्ग पर चलने वाली ट्रेनों की बात करें, तो 1 घण्टे के फासले में अप व डाउन मार्ग की 10 मालगाड़ियों को निकाला जाता है। यह सिर्फ मेनलाइन की स्थिति है, इससे समझा जा सकता है कि ट्रैक किस स्थिति से गु़जर रहा होगा। मालगाड़ी के कोच में वजन रखने की लिमिट तो तय कर दी गयी है, पर सच यही है कि इसमें जाने वाला सामान जेसीबी या अन्य मशीनों के जरिए लोड होता है, जिसका कोई पैमाना नहीं होता। यदा-कदा जाँच हो भी जाए, तो इसके लिए जुर्माने का ही प्राविधान है। ऐसे में ट्रैक को होने वाले नु़कसान का इससे कोई लेना-देना नहीं रह जाता। यदि पैसिंजर ट्रेनों की बात करें, तो इसके जनरल कोच व स्लीपर कोच की हालत किसी से छिपी नहीं है। एसी क्लास को छोड़कर इन दोनों श्रेणियों में क्षमता से तीन गुना अधिक यात्री भरे होते हैं। रेलवे का एक पुराना नियम कहता है कि वेटिंग लिस्ट वाले यात्री को यात्रा की अनुमति नहीं दी जा सकती, पर इसका पालन कभी नहीं हुआ। यही कारण है कोचों में क्षमता से कहीं अधिक वजन ट्रैक पर भी असर डालता है। यही नहीं, कोरियन एक्सप‌र्ट्स ने ट्रैक की मरम्मत के लिए लिये जाने वाले ब्लॉक को भी एक कारण बताया है। कहा गया है कि इस कार्य में कम से कम 3 घण्टे का समय लगता है, जिसमें आवागमन पूरी तरह बन्द होता है, पर हाइ ट्रैफिक के दबाव में इसे जल्दी करने का प्रयास किया जाता है, जिसमें कमियाँ रह जाने की प्रबलता अधिक होती है। चूँकि झाँसी-कानपुर रेलमार्ग पर दोहरीकरण अभी तक हुआ नहीं है, इसलिए ट्रैफिक बँटता भी नहीं और एक ही ट्रैक इतना लोड अकेले झेलता है। ऐसे में दोहरीकरण की महत्ता बेहतर समझ आती है। एक्सप‌र्ट्स ने ट्रैक सर्किटिंग न होने पर भी हैरानी जतायी है। इस प्रक्रिया में ट्रैक के अन्दर एक तार डाला जाता है, जिसमें करण्ट का प्रवाह कराया जाता है। यदि करण्ट का प्रवाह नहीं हो रहा, तो इसका मतलब कि कहीं कोई दिक्कत है। इस पर फॉल्ट तलाश कर ठीक कर लिया जाता है और सुरक्षा से खिलवाड़ नहीं होता। एक्सप‌र्ट्स ने इसे बुनियादी ़जरूरत बताया है। इन बिन्दुओं के ह़की़कत से हो रहे मिलान पर रेलवे कितना चेतता है और क्या ़कदम उठाता है, यह तो वक्त ही बताएगा।

 

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