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अब भाजपा का हथियार बनेंगी सहकारी समितियां


🗒 शनिवार, मई 20 2017
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 वर्ष 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में सूबे की सभी 80 सीटें हासिल करने के लिए भाजपा अनेक योजनाएं बना रही है। इस मिशन के लिए पार्टी की निगाह सहकारी समितियों पर भी टिकी है। सूबे की करीब आठ हजार प्रारंभिक सहकारी समितियों के जरिए पार्टी गांव, खेत-खलिहान और किसान का सामंजस्य बनाकर अपना मंसूबा पूरा करना चाहती है। इसलिए सहकारी समितियों पर काबिज होने को युद्ध स्तर पर रणनीति बन रही है। हालांकि इन समितियों पर अरसे से सपा का वर्चस्व है।

अब भाजपा का हथियार बनेंगी सहकारी समितियां

प्रारंभिक सहकारी समितियों का कार्यकाल 31 अक्टूबर तक समाप्त हो जाएगा। सूबे की आठ हजार से अधिक प्रारंभिक समितियों में करीब 1700 निर्जीव हो चुकी हैं। भाजपा का पहला टारगेट इन निर्जीव समितियों को जिंदा करना और संचालित समितियों में अधिक से अधिक अपने सदस्य बनाने हैं। सहकारिता मंत्री मुकुट विहारी वर्मा ने हाल में भाजपा मुख्यालय पर संगठन के साथ एक वृहद कार्यक्रम निर्धारित किया। भाजपा के प्रदेश महामंत्री विद्यासागर सोनकर, सहकारिता आंदोलन से जुड़े विधायक प्रकाश द्विवेदी और नेता बलवीर सिंह समेत कई लोगों का एक समूह इस दिशा में काम कर रहा है।

जिला स्तर पर कार्यसमिति की बैठकों में भी इस आंदोलन के लिए कार्ययोजना बनी है। बलवीर सिंह बताते हैं कि भाजपा सदस्यता अभियान चलाकर सहकारी समितियों में अधिक से अधिक भागीदारी करना चाहती है। वह बताते हैं कि पैक्स में लेन-देन करने वाले सदस्य ही समिति बनाते हैं। समिति अध्यक्ष और उपाध्यक्ष समेत नौ लोग चुने जाते हैं। फिर यही समिति डेलीगेट चुनती है और निचले स्तर से लेकर प्रदेश तक इसका स्वरूप बढ़ता जाता है। 
सपा का वर्चस्व तोडऩा चुनौती 
अंग्रेजों ने 1904 में ही सहकारिता आंदोलन की शुरुआत कर दी थी, लेकिन आजादी के बाद भी उत्तर प्रदेश में सहकारिता आंदोलन को दिशा नहीं मिली। 1970 के दशक में मुलायम सिंह यादव ने इस आंदोलन को जरूर धार दिया। बाद में शिवपाल सिंह यादव का वर्चस्व बढ़ा और अभी भी प्रदेश में सहकारी समितियों पर उनका प्रभाव बना हुआ है। सपा सरकार में शिवपाल सिंह यादव, उनकी पत्नी, उनके पुत्र के अलावा पूर्व सांसद छोटे सिंह यादव के पुत्र, आल इंडिया इफको के चेयरमैन रहे पूर्व सांसद चंद्रपाल सिंह के पुत्र, पूर्व मंत्री बनवारी सिंह यादव के पुत्र समेत सपा के कई बड़े नेताओं के पुत्र और परिवारों ने कब्जा जमा लिया।

निचले स्तर पर भी सपा समर्थकों का वर्चस्व बना हुआ है। भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता शलभ मणि त्रिपाठी कहते हैं कि 'उत्तर प्रदेश की जनता ने बसपा व सपा के जातिवाद और परिवारवाद के खिलाफ प्रचंड जनादेश देकर भाजपा को सत्ता सौंपी है। अब गुंडागर्दी के बल पर संगठनों पर काबिज होने वालों के दिन लद गए। अब लोकतांत्रिक पद्धति से चुनाव होगा। गांव और किसान की तरक्की के लिए सहकारिता आंदोलन को बढ़ावा मिलेगा।
सहकारी समितियों का स्वरूप 
प्रारंभिक स्तर : इसमें न्याय पंचायत स्तर पर गठित प्रारंभिक कृषि ऋण समितियां (पैक्स) तथा अन्य प्रारंभिक समितियां जैसे क्रय-विक्रय, प्राइमरी उपभोक्ता भंडार और सहकारी संघ। 
केंद्रीय स्तर : जिला सहकारी बैंक, जिला सहकारी विकास संघ और केन्द्रीय उपभोक्ता भंडार।
शीर्ष स्तर : उप्र कोआपरेटिव बैंक, उप्र सहकारी ग्राम विकास बैंक लिमिटेड, उप्र सहकारी संघ लि., उप्र उपभोक्ता सहकारी संघ लि., उप्र सहकारी विधायन एवं निर्माण सहकारी संघ लि., उप्र कोआपरेटिव यूनियन लि. तथा उप्र श्रम एवं निर्माण सहकारी संघ लि.। इनका विस्तार सामान्यत: राज्य स्तर पर होता है।

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