जेब में कार्ड मगर विदेश में 'डेबिट', बिना ओटीपी जालसाज खाते से निकाल रहे रकम

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जेब में कार्ड मगर विदेश में 'डेबिट', बिना ओटीपी जालसाज खाते से निकाल रहे रकम


🗒 गुरुवार, दिसंबर 07 2017
🖋 विक्रम सिंह यादव, प्रधान संपादक

 क्रेडिट और डेबिट कार्ड का इस्तेमाल करने वाले लोगों को सावधान होने की दरकार है। अगर आप अपनी जेब में कार्ड को रखकर खाते को महफूज समझ रहे हैं तो ऐसा नहीं है।

जेब में कार्ड मगर विदेश में 'डेबिट', बिना ओटीपी जालसाज खाते से निकाल रहे रकम

जालसाज बिना कार्ड को हाथ लगाए विदेशों में खाते से रुपये पार कर दे रहे हैं। राजधानी में ऐसे कई मामले लगातार सामने आने से साइबर क्राइम सेल भी हरकत में आ गई है। इस जालसाजी के पीछे स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के डेबिट-क्रेडिट कार्ड का डाटा चोरी कर बेचने की बात सामने आ रही है।

साइबर सेल में पहुंची ज्योति देवी ने खाते से 28,680 रुपये निकलने की शिकायत की। छानबीन करने पर पता चला कि उनके पास वन टाइम पासवर्ड (ओटीपी) भी नहीं आया था और खाते से विदेश में रुपये निकाल लिए गए। वहीं अनुपम कुमार श्रीवास्तव के खाते से भी 12,050 रुपये निकल गए। इसके बाद जब अनुपम की शिकायत की जांच हुई तो पता चला कि जालसाजों ने ऑक्ट्रा गूगल वेबसाइट के माध्यम से रुपये निकाले हैं। 

एसबीआइ के ग्राहक निशाने पर

पुलिस के मुताबिक क्रेडिट या डेबिट कार्ड से बिना ओटीपी के सर्वाधिक रुपये स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के ग्राहकों के निकले हैं। ऐसे में एसबीआइ के ग्राहकों के कार्ड का डाटा लीक होने की संभावना प्रबल हो गई है। साइबर जानकारों का कहना है कि एसबीआइ ने डेबिट व क्रेडिट कार्ड के कार्यो की जिम्मेदारी निजी संस्था को दे रखी है, जिसके कारण ऐसी तमाम समस्याएं सामने आ रही हैं। 

एफआइआर कराने को कड़ी मशक्कत 

लखनऊ में साइबर क्राइम के शिकार लोगों को थानों में एफआइआर कराने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है। साइबर सेल में लगभग हर रोज ऐसे पीडि़त आते हैं, जिन्हें थाने से पुलिसकर्मी टरका देते हैं। एलडीए कॉलोनी कानपुर रोड निवासी ज्योति देवी के एसबीआइ के खाते से 29 नवंबर को ठगों ने 28,680 रुपये निकाल लिए थे। मोबाइल फोन पर मैसेज आने के बाद ज्योति को इसकी जानकारी हुई।

खास बात यह है कि ज्योति ने ऑनलाइन बैंक की सुविधा भी नहीं ली थी, बावजूद इसके रुपये निकल गए। ज्योति ने जब कृष्णानगर थाने में इसकी शिकायत की तो उन्हें आशियाना थाने जाने को कहा गया। आरोप है कि ज्योति जब आशियाना थाने पहुंचीं तो उन्हें कृष्णानगर थाने में शिकायत करने की बात कही गई। पुलिसकर्मियों के एफआइआर नहीं दर्ज करने से परेशान ज्योति साइबर सेल पहुंचीं तो वहां उन्हें पहले रिपोर्ट दर्ज कराकर आने की बात कहकर वापस भेज दिया गया। पुलिस के इस व्यवहार से आहत ज्योति भावुक होकर साइबर सेल से भी खाली हाथ लौट गईं।

ऐसी वेबसाइट का ही प्रयोग करें, जो एसएसएल सर्टिफाइड हो। इसकी जानकारी ब्राउजर में ऊपर वाले बॉक्स में हरे रंग के ताले को देख कर की जा सकती है। हरे रंग के ताले वाली वेबसाइट सिक्योर मानी जाती है, जबकि लाल रंग सावधानी का सूचक है।

अपने कंप्यूटर का एंटी-वायरस अपडेट रखकर भी साइबर हमलावरों से बचा जा सकता है।

मोबाइल में ट्रांजैक्शन करने वाले आइडेंटिटी थेफ्ट डिटेक्शन एप्स इंस्टाल कर सकते हैं। इससे मोबाइल खोने की दशा में आपको आपका डाटा वापस मिल जाएगा। 

सोशल साइट्स पर ऑनलाइन एकाउंट का प्रयोग करने के बाद फौरन लॉगआउट कर दें। पासवर्ड समय-समय पर बदलते रहें।

गंदे व जीर्ण स्थिति में जो एटीएम हों, उनका प्रयोग न करें। वहां से फर्जी मशीन सेट कर डाटा चोरी की जा सकती है। 

दो बार पिन कोड मांगने वाले, जिन मशीनों से छेड़छाड़ की गई हो या वह जर्जर अवस्था में हो, उनका प्रयोग न करें। 

पिन नंबर डालते समय कीबोर्ड को ढक लें। 

किसी भी अपरिचित से एटीएम का प्रयोग करने के लिए मदद न मांगें।

सतर्कता ही सुरक्षा 

साइबर जालसाजों से बचने के लिए आपको खुद ही सतर्क रहना होगा। वे एक या एक से ज्यादा तरीकों से आपके कार्ड की जानकारी चुरा सकते हैं। इसके लिए एटीएम व ऑनलाइन पेमेंट करते समय सतर्कता जरूरी है।

यूं होता है कार्ड का डाटा चोरी 

आम तौर पर जालसाज स्कीमर (एक तरह की चिप) का प्रयोग करते हैं। इसे एटीएम मशीन में कार्ड लगाने वाली जगह लगाकर जानकारी चोरी की जाती है। इसमें कार्ड ट्रैपिंग के जरिए कार्ड की जानकारी कॉपी कर ली जाती है। इसके अलावा शोल्डर सर्फिंग तरीके से ठग मदद का झांसा देते हैं और फिर आपका कार्ड बदल देते हैं। कई बार जालसाज एटीएम में अपने हिडेन कैमरे लगा कर भी पिन चुराने के तरीके अपनाते हैं। यही नहीं, कीबोर्ड के ऊपर एक फर्जी कीबोर्ड लगाकर भी डाटा चोरी की जाती है। 

ऐसे होती है ऑनलाइन ठगी

कई बार ठग वास्तविक वेबसाइट से मिलती-जुलती फर्जी वेबसाइट बना लेते हैं। फिर वह सोशल मीडिया, मेल या अन्य तरीकों से लोगों को फर्जी वेबसाइट पर बुलाते हैं। इसके बाद वह कुछ बेचने या दान करने जैसी ट्रांजैक्शन के लिए लोगों को कहते हैं। इस पर डेबिट-क्रेडिट कार्ड या इंटरनेट बैंकिंग करते समय डाटा चोरी किया जा सकता है। इसमें भी कई तरह की तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है।

की-स्ट्रोक लॉजिंग व की-लॉगर साफ्टवेयर के जरिए ठग एक लिंक भेजते हैं। इसे डाउनलोड करने वाले व्यक्ति से ठग की-बोर्ड से भरी गई जानकारी को हासिल कर लेते हैं। इसमें बैंक आइडी, यूजरनेम और पासवर्ड जैसी जानकारियां शामिल होती हैं। वित्तीय लेनदेन के लिए कभी भी पब्लिक वाई-फाई का प्रयोग न करें। ऐसे लेन देन के लिए घर का इंटरनेट कनेक्शन या मोबाइल डेटा ज्यादा सुरक्षित है।

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