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25 वर्ष बाद फिर एक बार साथ आए बसपा व सपा


🗒 शुक्रवार, जनवरी 11 2019
🖋 विक्रम सिंह यादव, प्रधान संपादक

उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर इतिहास दोहराया जाएगा। लोकसभा चुनाव 2019 में भारतीय जनता पार्टी को शिकस्त देने को धुर विरोधी एक मंच पर आ रहे हैं। 1993 में मुलायम सिंह यादव ने कांशीराम के साथ गठबंधन किया था तो अब अखिलेश यादव तथा मायावती के नेतृत्व में गठबंधन हो रहा है। 25 वर्ष बाद होने वाले इस बड़े गठबंधन पर सभी की निगाहें हैं।

25 वर्ष बाद फिर एक बार साथ आए बसपा व सपा

लोकसभा चुनाव 2019 के लिए उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी अब गठबंधन की राह पर हैं। भारतीय जनता पार्टी के प्रभाव को कम करने के लिए इससे पहले 1993 में मुलायम सिंह यादव ने दांव खेला था और कांशीराम के साथ गठबंधन कर उत्तर प्रदेश में भाजपा को शिकस्त दी थी। अब 25 वर्ष बाद अखिलेश और मायावती के लिए पहले जैसे नतीजे दोहराना एक बड़ी चुनौती है।लोकसभा चुनाव 2019 में भाजपा की सभी तैयारी को बेकार करने के इरादे से नया योजना बनी है। प्रदेश की सियासत में नई इबारत लिखी जा रही है। 2019 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को मात देने लिए 23 वर्ष पुरानी दुश्मनी भुलाकर समाजवादी पार्टी ने बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन तय कर लिया है। 1993 में राम मंदिर आंदोलन पर सवार भाजपा को हराने वाली मुलायम-कांशीराम की जोड़ी की तरह मोदी लहर पर सवार पार्टी को हराने के लिए अखिलेश-मायावती की जोड़ी बन रही है। माया-अखिलेश वाले इस गठबंधन के लिए 25 साल पहले जैसे नतीजे दोहराना बड़ी चुनौती माना जा रहा है।अखिलेश यादव और मायावती कांग्रेस को किनारे कर उत्तर प्रदेश में गठबंधन कर रहे हैं। कल लखनऊ में दोनों नेताओं की संयुक्त प्रेस वार्ता के बाद सीट बंटवारा भी तय होगा। अभी तक माना जा रहा है कि बहुजन समाज पार्टी 37, समाजवादी पार्टी 36 तथा इनके साथ ही मैदान में उतरने वाली राष्ट्रीय लोकदल तीन सीट पर अपने प्रत्याशी को उतारेंगे। रायबरेली व अमेठी में गठबंधन का प्रत्याशी नहीं उतरेगा जबकि पीस पार्टी व निषाद पार्टी को भी एक-एक सीट दी जा सकती है।

सपा-बसपा ने 25 साल पहले जब हाथ मिलाया था वह दौर मंडल का था। जिसने सूबे के ही नहीं बल्कि देश के पिछड़ों को एक साथ लाकर खड़ा कर दिया था। मुलायम सिंह यादव ओबीसी के बड़े नेता बनकर उभरे थे। राम मंदिर आंदोलन के चलते मुस्लिम मतदाता भी उनके साथ एकजुट था। इसके अलावा कांशीराम भी दलित और ओबीसी जातियों के नेता बनकर उभरे थे। जब दोनों ने हाथ मिलाया तो सामाजिक न्याय की उम्मीद जगी थी। इसी का नतीजा था कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद भी भाजपा सत्ता में वापसी नहीं कर पाई थी। 1993 में उत्‍तर प्रदेश की 422 विधानसभा सीटों के लिए चुनाव हुए थे। इनमें बसपा और सपा ने गठबंधन करके चुनाव लड़ा था। दोनों ने संयुक्‍त रूप से 420 सीटों पर प्रत्‍याशी उतारे थे। दोनों दलों ने 176 सीट ने जीत दर्ज की थी। इनमें बसपा ने 164 प्रत्याशी उतारे थे, जिनमें से 67 प्रत्याशी जीते थे। सपा ने इन चुनावों में अपने 256 प्रत्याशी उतारे थे। इनमें से उसके 109 जीते थे। सपा-बसपा गठबंधन के बावजूद भाजपा ने 177 विधानसभा सीटें जीती थीं। उस समय भी सपा और बसपा ने प्रदेश में भाजपा की सरकार को बनने से रोकने के लिए अन्य दलों को साथ मिलाया था। 4 दिसंबर 1993 को मुलायम सिंह यादव के नेतृत्‍व में सपा-बसपा की सरकार बनी थी। इनके बीच गठबंधन 1995 में टूट गया, जिसके बाद यादव और दलितों के बीच एक गहरी खाई पैदा हो गई।भाजपा उत्तर प्रदेश में अपने जनाधार को बढ़ाने के लिए 2014 और 2017 के विधानसभा चुनाव में गैर यादव ओबीसी और गैर जाटव दलितों को अपने साथ मिलाने में कामयाब रही है। इसी कारण पहले लोकसभा और फिर विधानसभा में भाजपा के सामने सपा-बसपा पूरी तरह से धराशाही हो गई थीं। भाजपा ने सत्ता में आने के बाद सरकार में इन दलित व ओबीसी जातियों को हिस्सेदार भी बनाया है। इतना ही नहीं ओबीसी को मिलने वाले 27 फीसदी आरक्षण को भी भाजपा तीन वर्ग में बांटने की रणनीति पर काम कर रही है।ऐसे में सपा-बसपा गठबंधन के लिए सबसे बड़ी चुनौती दलित व ओबीसी जातियों को अपने साथ जोडऩे की होगी। दरअसल सपा-बसपा पर आरोप लगता रहा है कि यह यादव, मुस्लिम और जाटवों की पार्टी हैं। राजनीति में गैर-यादव ओबीसी और गैर जाटव दलितों के अंदर भी राजनीतिक चेतना जागी है। इन्हें साधे बिना भाजपा को मात देना अखिलेश और मायावती के लिए टेढ़ी खीर होगा।

उत्तर प्रदेश में इस समय 22 फीसदी दलित वोटर हैं, जिनमें 14 फीसदी जाटव शामिल हैं। बसपा का सबसे मजबूत वोट है। बाकी 8 फीसदी दलित मतदाताओं में पासी, धोबी, खटीक मुसहर, कोली, वाल्मीकि, गोंड, खरवार सहित 60 जातियां हैं। 45 फीसदी के करीब ओबीसी मतदाता हैं। इनमें यादव 10 फीसदी, कुर्मी पांच फीसदी, मौर्य पांच फीसदी, लोधी चार फीसदी और जाट दो फीसदी हैं। बाकी बचे 19 फीसदी में गुर्जर, राजभर, बिंद, बियार, मल्लाह, निषाद, चौरसिया, प्रजापति, लोहार, कहार, कुम्हार सहित 100 से ज्यादा उपजातियां हैं। 19 फीसदी के करीब मुस्लिम हैं।2014 के लोकसभा चुनाव में यूपी की 80 संसदीय सीटों में से भाजपा गठबंधन में 73 सीटें जीतने में सफल रही थी और बाकी 7 सीटें विपक्ष को मिली थीं। भाजपा को 71, अपना दल को दो कांग्रेस को दो और सपा को पांच सीट मिली थी। बसपा का खाता तक नहीं खुल सका था। सूबे की तीन लोकसभा सीटों पर उपचुनाव हुए हैं, जिनमें से दो पर सपा और एक पर आरएलडी को जीत मिली थी। अब भाजपा के पास 68 सीटें बची हैं और सपा की सात सीटे हो गई है। 

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