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शिक्षा मित्रों की उम्मीददिल्ली में प्रस्तावित जंतर मंतर प्रदर्शन पर टिकी


🗒 मंगलवार, फरवरी 05 2019
🖋 विक्रम सिंह यादव, प्रधान संपादक

उत्तर प्रदेश सरकार से अपेक्षाओं के अनुरूप निराशा हाथ लगने के बाद शिक्षामित्र अब दिल्ली दरबार में अपनी बात पहुंचाने जा रहे हैं। इसके लिए जंतर-मंतर पर बड़ा आंदोलन होगा। प्राथमिक शिक्षामित्र संघ ने जिले-जिले इसकी तैयारियां शुरू कर दी हैं। दिल्ली प्रदर्शन में हर जिले से कम से कम 15 सौ शिक्षामित्र पहुंचने का अनुमान है। उल्लेखनीय है कि शिक्षामित्रों का प्रदर् लंबे समय से जारी है। धरना, प्रदर्शन, आंदोलन में सामूहिक सिर मुंडवाना और अर्द्धनग्न जैसे विरोध प्रदर्शन शामिल रहे। इसकेे अलावा जिलों में धरना प्रदर्शन सतत जारी है। यूपी में इस समय शिक्षामित्रों की संख्या करीब 1 लाख 78 हजार है। 

शिक्षा मित्रों की उम्मीददिल्ली में प्रस्तावित जंतर मंतर प्रदर्शन पर टिकी

प्राथमिक शिक्षामित्र संघ की जिला इकाइयों ने बैठक कर आगे की रणनीति तय कर दी है। ऐसे ही एक जिलाध्यक्ष ने बताया कि भाजपा सरकार को अपना वादा याद दिलाने के लिए उत्तर प्रदेश के शिक्षामित्र दिल्ली के जंतर-मंतर पर अपनी बात रखेंगे। साथ ही सरकार से अपना हक वापस लेकर ही लौटेंगे। उनका कहना है कि शिक्षामित्रों को अब तक जो कुछ भी मिला, वह सिर्फ संघर्ष की बदौलत है। इस बार शिक्षामित्र आर-पार के मूड से दिल्ली पहुंचेंगे। ऐसे ही एक और नेता ने बताया कि हर जिले से 15 सौ शिक्षामित्रों को दिल्ली ले जाने का लक्ष्य जिला संगठन ने रखा है। प्रदर्शन की रणनीति के तहत विभिन्न ब्लॉकों से बसों छोटी गाडिय़ों और ट्रेन से शिक्षामित्र छह फरवरी से रवाना होने लगेंगे।उत्तर प्रदेश के शिक्षामित्रों का प्रदर्शन 25 जुलाई 2017 के सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद से शुरू हुआ है जिसके तहत कोर्ट ने शिक्षामित्रों को सहायक शिक्षक मानने से इन्कार कर दिया था। ध्यान रहे कि नियुक्ति से लेकर अब तक शिक्षामित्र कई बार प्रदर्शन कर चुके हैं लेकिन हर बार इन्हें सरकारी लॉलीपॉप थमा दिया जाता रहा है।शिक्षामित्रों की नियुक्ति, जिम्मेदारी और काम से जुड़ी कई कहानियां और दिक्कतें है जो उन्हें बार-बार सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर करती रही हैं।शिक्षामित्रों की  नियुक्ति के कालक्रम पर नजर डालें तो 1999 में यूपी में कल्याण सिंह नीत भाजपा सरकार में शिक्षा की हालत खराब थी। शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करने के सरकार के फैसले के नियमित शिक्षकों की जगह पर शिक्षामित्रों की नियुक्ति की गई। उस वक्त उत्तर प्रदेश में शिक्षकों की नियुक्ति के लिए इंटरमीडिएट के साथ बीटीसी (बेसिक ट्रेनिंग सर्टिफिकेट) की ज़रूरत थी। हर 40 बच्चे पर एक शिक्षक की ज़रूरत थी लेकिन इतनी बड़ी संख्या में बीटीसी धारक नहीं थे, इसलिए शिक्षामित्रों की नियुक्ति के लिए योग्यता को सिर्फ 12वीं पास कर दिया गया ताकि शिक्षामित्र पहली और दूसरी क्लास के बच्चों को पढ़ा सकें।1999 में आदेश के बाद पूरे प्रदेश में शिक्षामित्रों की भर्ती शुरू हो गई। 2008 तक पूरे प्रदेश में शिक्षामित्रों की भर्तियां हुईं और इनकी संख्या एक लाख 71 हजार तक पहुंच गई। इनकी शुरुआती तनख्वाह 1800 रुपये महीना थी। इन्हें साल के 11 महीने वेतन मिलना था। इन भर्तियों के साथ ही उत्तर प्रदेश के उन हजारों स्कूलों के ताले खुल गए जहां पर शिक्षकों की कमी की वजह से वो बंद पड़ गए थे। भर्ती होने के बाद हजारों की संख्या में शिक्षामित्र लोगों के घर-घर गए और वहां पर लोगों को मनाकर उनके बच्चों को स्कूल लेकर आए, ताकि उन्हें पढ़ाया-लिखाया जा सके। 2 जून 2010 को प्रदेश में शिक्षामित्रों की भर्ती पर रोक लगा दी गई।

मायावती सरकार ने 2011 में इन्हें शिक्षक बनने की ट्रेनिंग दिलवाकर नियमित करने की कवायद शुरू कर दी। यह फैसला 11 जुलाई 2011 को लिया गया। सरकार ने तय किया कि इन शिक्षामित्रों के लिए दो चरणों में दो-दो साल का दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से बीटीसी कोर्स करवाया जाएगा। 2012 में इनकी ट्रेनिंग शुरू हो गई। वहीं 2012 में ही मायावती की सरकार चली गई और फिर अखिलेश यादव प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बन गए। उन्होंने भी ट्रेनिंग का कार्यक्रम जारी रखा। 2012 से 2014 के बीच पहले चरण के शिक्षामित्रों को बीटीसी की ट्रेनिंग मिल गई।पहले चरण में कुल 58 हजार शिक्षामित्र थे जिन्हें सहायक अध्यापक के पद पर नियुक्त कर दिया गया। दूसरे बैच की ट्रेनिंग 2015 में पूरी हुई और 5 मई 2015 को करीब 90 हजार शिक्षामित्रों को सहायक अध्यापक के पद पर नियुक्त कर दिया गया। सहायक अध्यापक की नियुक्ति से ठीक पहले इनकी तनख्वाह 1800 रुपये से बढ़कर मात्र 3500 रुपये तक पहुंची थी। सहायक अध्यापक के पद पर नियुक्त होने के बाद इनकी तनख्वाह 38,878 रुपये हो गई। अब शिक्षामित्रों की संख्या 1 लाख 78 हजार के करीब है। इस बीच टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट (TET) पास कर बने शिक्षकों को फैसला रास नहीं आया। वह सरकार के इस फैसले के खिलाफ इलाहाबाद हाई कोर्ट चले गए। 12 सितंबर 2015 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सरकार के खिलाफ फैसला दिया और शिक्षामित्रों का सहायक अध्यापक के पद पर हुआ समायोजन रद कर दिया। इस फैसले के खिलाफ सपा सरकार के साथ समायोजित शिक्षामित्र भी सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए। दो साल तक सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चलती रही। इसके बाद 25 जुलाई 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने पूरी तरह से शिक्षामित्रों के खिलाफ फैसला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए शिक्षामित्रों का समायोजन रद कर दिया।

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