बसपा कांग्रेस से दूरी बनाए रखने में ही फायदा देख रही

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बसपा कांग्रेस से दूरी बनाए रखने में ही फायदा देख रही


🗒 मंगलवार, मार्च 19 2019
🖋 विक्रम सिंह यादव, प्रधान संपादक

भाजपा को हराने के लिए भले ही कांग्रेस मायावती के लिए लोकसभा की सीट छोडऩे को तैयार है लेकिन, बसपा प्रमुख कांग्रेस के प्रति जरा भी नरमी बरतने वाली नहीं हैैं। मायावती न खुद चुनाव मैदान में उतरकर कांग्रेस का सहयोग लेंगी और न ही दूसरे राज्यों में कांग्रेस के साथ खड़ी होंगी। बसपा प्रमुख को कांग्रेस से दूरी बनाए रखने में ही अपनी भलाई दिख रही है।दरअसल, तकरीबन 35 वर्ष पूर्व कांशीराम ने कांग्रेस पार्टी की नीतियों का विरोध करते हुए ही वर्ष 1984 में बहुजन समाज पार्टी का गठन किया था। पहले-पहल दलित समाज और फिर मुस्लिम समाज के भी बसपा से जुडऩे का ही नतीजा रहा कि कांग्रेस का जनाधार घटता गया और बसपा सत्ता में भागीदार बनती रही। वर्ष 2007 में तो सोशल इंजीनियरिंग के तहत अपर कास्ट को भी साथ लेकर बसपा सूबे में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने तक में कामयाब रही है।

बसपा कांग्रेस से दूरी बनाए रखने में ही फायदा देख रही

पिछले लोकसभा चुनाव में शून्य पर सिमटने के बाद भाजपा से मुकाबले के लिए मायावती ने अबकी सपा से तो अप्रत्याशित तौर पर गठबंधन किया है लेकिन कांग्रेस से दूरी बनाए रखी। इतना ही नहीं अमेठी-रायबरेली से गठबंधन के चुनाव न लडऩे पर कांग्रेस द्वारा मायावती के खिलाफ प्रत्याशी न उतरने की घोषणा भी बसपा प्रमुख को रास नहीं आई। कांग्रेस को आड़े हाथों लेते हुए मायावती ने उस पर भ्रम फैलाने तक का आरोप जड़ दिया।दलित वोट बैैंक साधने के लिए प्रियंका वाड्रा द्वारा भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर से मिलने से भी मायावती कांग्रेस से बेहद नाराज हैैं। यही कारण है कि मायावती, भाजपा के साथ ही कांग्रेस पर भी सदैव हमलावर रहती हैैं। बसपा प्रमुख कांग्रेस व भाजपा को एक सोच का बताते हुए कहती रही हैैं कि 1975 में कांग्रेस ने घोषित इमरजेंसी लगाई थी और अब भाजपा ने अघोषित। रक्षा सौदों के घोटाले में दोनों एक समान हैं। बसपा प्रमुख तो यहां तक कहती रही हैैं कि गठबंधन होने पर कांग्रेस का वोट सहयोगी को ट्रांसफर नहीं होता। अपनी बात के समर्थन में वह 1996 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से बसपा के और 2017 में सपा से समझौते की याद दिलाती रही हैैं।पार्टी के जानकारों का कहना है कि बसपा के लिए कभी भी कांग्रेस न फायदेमंद रही है और न ही हो सकती है। कारण हैं कि कांग्रेस के विरोध पर ही बसपा खड़ी हुई। बसपा नेताओं का मानना है कि बहकावे में आकर भाजपा के साथ जाने वाला उनका वोटर तो वापस उनके साथ आ जा सकता है लेकिन कांग्रेस से हाथ मिलाने पर खासतौर से दलित व मुस्लिम वोटर एक बार फिर उस ओर खिसक सकते हैैं जिससे बसपा के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है।

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