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गंगा किनारे बसे शहरों में खतरनाक हो रहा गंगा का पानी, सर्वाधिक गॉल ब्लाडर कैंसर


🗒 शुक्रवार, जून 01 2018
🖋 विक्रम सिंह यादव, प्रधान संपादक

गंगा किनारे बसे शहरों में सर्वाधिक मामले गॉल ब्लाडर (पित्त की थैली) के कैंसर के सामने आ रहे हैं। जेके कैंसर संस्थान में हुए अध्ययन में पता चला कि इनमें ज्यादातर केस कानपुर, इलाहाबाद और वाराणसी के हैं। इसकी वजह जानने को अध्ययन कर रहे विशेषज्ञ गंगा में बढ़ते प्रदूषण को प्रमुख कारण मान रहे हैं।

गंगा किनारे बसे शहरों में खतरनाक हो रहा गंगा का पानी, सर्वाधिक गॉल ब्लाडर कैंसर

विशेषज्ञों का कहना है कि गोमुख से लेकर बंगाल की खाड़ी तक गंगा हमारी लाइफ लाइन हैं। उत्तर भारत के प्रमुख शहर तट पर बसे हैं। फिर भी लोग गंगा को प्रदूषित कर रहे हैं। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ नॉन कम्युनिकेबल डिसीज, बेंगलुरु की रिपोर्ट में भी गंगा के तटीय क्षेत्र में गॉल ब्लाडर के मामले सर्वाधिक पाए गए हैं। इस रिपोर्ट के बाद भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) के हास्पिटल बेस्ड कैंसर रजिस्ट्री (एचबीसीआर) से वर्ष 2015 में सूबे के पहले सेंटर के रूप में जेके कैंसर संस्थान को जोड़ा गया।

एचबीसीआर को देश के प्रमुख कैंसर संस्थान विभिन्न प्रकार के कैंसर मरीजों के आंकड़े भेजते हैं। यहां के विशेषज्ञ ऑनलाइन मानीटरिंग के दौरान जेके कैंसर संस्थान से गॉल ब्लॉडर के सर्वाधिक केस रिपोर्ट होने से हैरान हैं और संस्थान के नोडल अफसर डॉ. शरद सिंह से संपर्क कर वजह जानने का प्रयास किया।

डॉ. शरद सिंह ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) कानपुर व कई प्रमुख संस्थानों के साथ मिलकर अध्ययन शुरू किया। जुटाए गए आंकड़ों में पता चला ईरान से लेकर थाइलैंड तक 700 किलोमीटर चौड़ाई की पट्टी में गॉल ब्लॉडर कैंसर के मामले अधिक पाए जा रहे हैं। इसमें गंगा के दाएं व बाएं किनारे की चार-पांच किलोमीटर की चौड़ी पट्टी आती है। इन तटवर्ती क्षेत्रों में गॉल ब्लॉडर के केस मिल रहे हैं। इसकी वजह जानने को प्रोजेक्ट तैयार कर भेजा गया है जो लंबित हैं।

जेके कैंसर संस्थान की ओपीडी में रोज औसतन 150-200 मरीज आते हैं। इनमें कैंसर के नए मरीज 50-60 होते हैं, जिसमें 10-12 मरीज गॉल ब्लाडर कैंसर के होते हैं। डॉ. सिंह ने पाया कि संस्थान में वाराणसी, बलिया, इलाहाबाद, कानपुर, उन्नाव एवं फर्रुखाबाद के मरीज अधिक थे, जिनमें यह बीमारी पाई गई।

बीमारी की स्पष्ट नहीं वजह

डॉ. सिंह बताते हैं कि गॉल ब्लॉडर में कैंसर की स्पष्ट वजह अभी तक सामने नहीं है। प्रारंभिक अध्ययन से यह पता चलता है कि गंगा में घुलित हैवी मेटल में जिंक, लेड, कॉपर, निकिल, आर्सेनिक, सिलेनियम व कैडमियम है। इसके अलावा गंगा की सहायक नदी रामगंगा के पानी में घुलित पीतल के काम का प्रदूषण एवं ई कचरा, डाई का उत्सर्जन, टेनरियों के डिस्चार्ज में घुलित क्रोमियम है। यह केमिकल पानी के साथ शरीर में जा रहे हैं। इसके अलावा गॉल ब्लाडर में पथरी (कोली लिथियासिस) के 10 में से नौ मरीजों में आगे चलकर कैंसर पाया गया। हालांकि पथरी होने की ठोस वजह का अभी पता नहीं चल सका है।

जेके कैंसर में आए गॉल ब्लॉडर के नए कैंसर मरीज

1200 मरीज वर्ष 2017

950 मरीज वर्ष 2016

808 मरीज वर्ष 2015

705 मरीज वर्ष 2014

युवावस्था में भी लोग चपेट में आ रहे हैं

जेके कैंसर संस्थान के निदेशक डॉ. एमपी मिश्रा ने बताया कि मुख कैंसर के बाद गॉल ब्लाडर के केस सर्वाधिक रिपोर्ट होते हैं। इसका स्पष्ट लक्षण न होने से काफी विलंब से आते हैं। ऐसे में कैंसर लिवर, छोटी आंत एवं पैंक्रियाज तक फैल चुका होता है। ऐसे मरीजों की जान बचाना मुश्किल होता है। वहीं, एचबीसीआर के नोडल अफसर डॉ. शरद सिंह ने बताय कि गॉल ब्लाडर का कैंसर महामारी का रूप ले रहा है। अब युवावस्था में भी लोग चपेट में आ रहे हैं। इसलिए कैंसर की वजह जानना जरूरी है। इस पर हुए अध्ययन को आगे बढ़ाने की जरूरत है, ताकि मरीजों को लाभ मिल सके।  

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