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चुनावी नतीजों की पहली बलि चढ़ेगा संसद सत्र, विपक्ष हावी, अपनों के निशाने पर भाजपा


🗒 बुधवार, दिसंबर 12 2018
🖋 विक्रम सिंह यादव, प्रधान संपादक

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव नतीजों की पहली बलि संसद का शीतकालीन सत्र चढ़ सकता है। जीत से उत्साहित विपक्ष सदन में हावी होने की करेगा, जिसका संकेत बुधवार को संसद के पहले कामकाजी दिन से ही मिलने लगा। संसद के दोनों सदनों में सभी दल अपने-अपने राग अलापते रहे, जिससे इसी शोर शराबा के बीच संसद की कार्यवाही ठप रही। हिंदी बहुल तीनों राज्यों में हार के बाद तो भाजपा अपने सहयोगी दलों के निशाने पर भी रही। आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर संसद राजनीति का अखाड़ा बन सकती है।

चुनावी नतीजों की पहली बलि चढ़ेगा संसद सत्र, विपक्ष हावी, अपनों के निशाने पर भाजपा

हिंदी बहुल राज्यों छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में सत्तारुढ़ भाजपा की हार से उत्साहित प्रमुख विपक्षी कांग्रेस के साथ सपा और बसपा जैसी पार्टियों ने संसद में सरकार के खिलाफ दो-दो हाथ करने की तैयारी में हैं। लोकसभा चुनाव के मद्देनजर प्रस्तावित महागठबंधन को लेकर विपक्षी दलों के बीच जुगलबंदी होने लगी है। राफेल सौदे में भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाकर कांग्रेस मामले को संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को सौंपने की मांग पर अड़ेगी, जबकि सरकार इसे सिरे से खारिज कर सकती है।संसद में सभी विपक्षी दल किसानों के मसले पर सरकार पर बरसेंगे, जबकि सरकार अपनी उपलब्धियां गिनाने से बाज नहीं आएगी। यह मुद्दा सड़क से लेकर संसद तक गरमाएगा। जबकि भाजपा अगस्ता वेस्टलैंड हेलिकाप्टर सौदे में गिरफ्तार बिचौलिए के प्रत्यर्पण और उसमें कांग्रेस मिलीभगत पर चुटकी काटने से बाज नहीं आयेगी। तीन तलाक विधेयक को पारित कराने की कोशिश होगी, जिसमें सरकार विपक्षी दलों को घेरने की कोशिश की जाएगी।तीन बड़े राज्यों में हार के बाद भाजपा पर उसके सहयोगी दल भी आक्रामक हो गये हैं। नाराज शिवसेना अयोध्या में श्रीराम मंदिर के तत्काल निर्माण की मांग को लेकर संसद में हंगामा कर सकती है। केंद्र सरकार की समर्थक दक्षिणी राज्य तमिलनाडु की प्रमुख पार्टी एआईडीएमके ने एक बार फिर कावेरी जल विवाद का मुद्दा उठाया। इसी मसले पर इस दल ने मानसून सत्र को बाधित किया था, जिसे विपक्ष ने माना कि सरकार के इशारे पर सदन का बाधित कराया गया।राजग से अलग हुई तेलुगू देशम पार्टी चालू सत्र में भी पूर्व की भांति आंध्र प्रदेश को विशेष वित्तीय पैकेज का मसला जोर शोर से उठायेगी, जिसमें उसका साथ अन्य विपक्षी दल भी देंगे। सपा और बसपा जैसे दलों को चुनावी राज्यों में मिली सफलता से उनका उत्साह बहुत बढ़ा हुआ है। आगामी लोकसभा चुनाव से पहले का यह पहला पूर्ण सत्र होगा, जिसमें सभी दल अपनी-अपनी राजनीतिक हैसियत का प्रदर्शन करने की कोशिश करेंगे।

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