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संसद के हंगामे से अटक सकता है स्कूली शिक्षा में सुधार की रफ्तार का बिल


🗒 गुरुवार, दिसंबर 13 2018
🖋 विक्रम सिंह यादव, प्रधान संपादक

 स्कूली शिक्षा में सुधार में जुटी सरकार की राह में फिलहाल स्कूलों में आठवीं तक फेल न करने की नीति में बदलाव सबसे बड़ा रोड़ा बना हुआ है। इसके चलते स्कूली शिक्षा में सुधार की पूरी गाड़ी अटकी पड़ी है। हालांकि सरकार इससे जुड़े बिल को ससंद के पिछले दो सत्रों से पारित कराने की कोशिश में जुटी है, लेकिन हंगामे के चलते शिक्षा में सुधार से जुड़ा यह अहम बिल पारित नहीं हो पा रहा है। इस बिल को लेकर सरकार की रूचि का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है, कि राज्यसभा की कार्यसूची में पहले दिन से सरकार ने इसे सबसे ऊपर रखा है।

संसद के हंगामे से अटक सकता है स्कूली शिक्षा में सुधार की रफ्तार का बिल

हालांकि इस सब के बीच सरकार ने शीतकालीन सत्र में इसे पारित कराने की पूरी तैयारी की थी, लेकिन पिछले दो दिनों से संसद में जिस तरह से हंगामा चल रहा है, उसे देख सरकार के चेहरे भी उतरे हुए है। यह स्थिति तब है, जब स्कूली शिक्षा में सुधार के इस बिल को 25 राज्यों का खुला समर्थन है। यह सभी राज्य अपने यहां इस बदलाव को जल्द से जल्द लागू करना चाहते है, लेकिन राज्यसभा में इस बिल के फंसे होने से पूरी योजना पर पानी फिरता दिख रहा है।मानव संसाधन विकास मंत्रालय का मानना है कि इस बदलाव के बाद स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार आएगा। क्योंकि मौजूदा समय में आठवीं तक छात्रों को फेल न करने की नीति से शैक्षणिक गुणवत्ता में पहले के मुकाबले गिरावट आई है।हालांकि चार राज्य अभी परीक्षा में बदलाव की इस नीति के खिलाफ है, इनमें आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, उड़ीसा और तेलंगाना शामिल है। इन राज्यों ने पिछले दिनों कैब (सेंट्रल एडवाइजरी बोर्ड ऑफ एजुकेशन) की बैठक में भी इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया था। यही वजह है कि सरकार ने परीक्षा में बदलाव की नीति में राज्यों को इस मामले में पूर्ण स्वायत्ता दे दी है। फिलहाल बदलाव का यह बिल लोकसभा से पारित हो चुका है। अब इसे राज्यसभा से पारित होना बाकी है।गौरतलब है कि यूपीए सरकार के दौरान बच्चों में स्कूल छोड़ने की बढ़ती संख्या को देखते हुए आठवीं तक फेल न करने की नीति लायी है। इसके चलते प्रत्येक छात्र आठवीं तक पास होता चला जाता है, जबकि नौवीं में वह फेल हो जाता है। ऐसे में नौवीं में अचानक छात्रों के फेल होने की संख्या बढ़ गई थी। हालांकि सरकार का दावा है कि इसके चलते स्कूल मिड-डे मील सेंटर के रूप में तब्दील होकर रह गए थे।

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