अब बड़े उद्योगों से कर्ज वसूली की प्रक्रिया अब रफ्तार पकड़ेगी, भूषण स्टील का अधिग्रहण पहली सफलता

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अब बड़े उद्योगों से कर्ज वसूली की प्रक्रिया अब रफ्तार पकड़ेगी, भूषण स्टील का अधिग्रहण पहली सफलता


🗒 रविवार, मई 20 2018
🖋 विक्रम सिंह यादव, प्रधान संपादक

भूषण स्टील का टाटा स्टील की तरफ से किये गये अधिग्रहण से यह उम्मीद जगी है कि बैंकों से लाखों करोड़ रुपये नहीं चुकाने वाले बड़े उद्योगों से कर्ज वसूली की प्रक्रिया अब रफ्तार पकड़ेगी,

अब बड़े उद्योगों से कर्ज वसूली की प्रक्रिया अब रफ्तार पकड़ेगी, भूषण स्टील का अधिग्रहण पहली सफलता

लेकिन नए दिवालिया कानून (आइबीसी) के तहत आरबीआइ ने जिन एक दर्जन कंपनियों से कर्ज वसूलने की प्रक्रिया शुरु की थी उनमें से अधिकांश की स्थिति बहुत उत्साहजनक नहीं है। अभी 11 कंपनियों को लेकर फैसला होना बाकी है। इनमें से 6-7 कंपनियों में दिवालिया प्रक्रिया इतनी उलझ गई है कि उनकी राह निकलती भी मुश्किल जान पड़ती है। इन कंपनियों पर देश के तमाम बैंकों के 2,36,483 करोड़ रुपये बकाये हैं। भूषण स्टील के बाद इस सूची में बची अन्य कंपनियों में जारी दिवालिया प्रक्रिया की मौजूदा स्थिति कुछ ऐसी है।

झारखंड स्थित सालाना 25 लाख टन क्षमता वाली इस कंपनी के लिए सबसे ज्यादा बोली अनिल अग्रवाल की कंपनी वेदांता लिमिटेड ने लगाई थी। कंपनी पर बैंकों के 10,273 करोड़ रुपये बकाये थे। राष्ट्रीय कंपनी कानून ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) ने इस प्रस्ताव को मंजूरी भी दे दी लेकिन इसके लिए बोली लगाने एक अन्य कंपनी रेसां स्टील ने अपीलीय प्राधिकरण में मामला दायर कर दिया है। यह मामला बोली लगाने में दूसरे स्थान की कंपनी टाटा स्टील के दावे को लेकर है। मामला अभी लंबा खींच सकता है।

एस्सार स्टील: आरबीआइ की पहली सूची में शामिल यह दूसरी सबसे बड़ी कंपनी थी। कंपनी पर बैंकों के 37,284 हजार करोड़ रुपये बकाया थे। इसे खरीदने के लिए दुनिया की दिग्गज स्टील कंपनी आर्सेलर मित्तल ने सबसे ज्यादा बोली लगाई। लेकिन दूसरे नंबर पर न्यूमेटल है। आर्सेलर मित्तल की तरफ से कंपनी पर बकाये 8000 करोड़ रुपये के कर्ज का सीधा भुगतान करने का आफर दिया गया है। न्यूमेटल नए प्रस्ताव के साथ आई है और अगले मंगलवार को इस पर सुनवाई होगी। बताते चलें कि न्यूमेटल रूस के दूसरे सबसे बड़े बैंक वीटीबी समूह की अगुवाई में बना एक कंसोर्टियम है। संभवत: भूषण स्टील के बाद इसी कंपनी पर अंतिम फैसला हो।

जेपी इंफ्रा: बैंकों के 9,635 करोड़ रुपये नहीं चुकाने की वजह से इसे आरबीआइ ने इंसॉल्वेंसी बैंकिंग कोड कानून के तहत दिवालिया प्रक्रिया में डाला था। इस कंपनी का मामला पूरी तरह से कानूनी पचड़े में फंसा है। सबसे ज्यादा बोली लगाने वाली लक्षद्वीप के प्रस्ताव को तमाम दूसरे कर्जदारों ने ठुकरा दिया। लक्षद्वीप ने कहा है कि वह दोबारा ज्यादा आकर्षक प्रस्ताव देने को तैयार है। मामला सुप्रीम कोर्ट में भी चल रहा है। मामला जेपी इंफ्रा के आवासीय परियोजनाओं से जुड़ा होने की वजह से भी ज्यादा उलझ गया है। दिवालिया प्रक्रिया हाल फिलहाल सुलझ जाएगी, इसकी उम्मीद कम है।

लैंको इंफ्रा, एबीजी शिपयार्ड और आलोक इंडस्ट्रीड: इन कंपनियों पर बैंकों के क्रमश: 44,364, करोड रुपये, 6,953 करोड़ और 22,075 करोड़ रुपये बतौर एनपीए फंसा हुआ है। आरबीआइ की सूची में शामिल इन तीनों कंपनियों के कर्ज वसूली को लेकर इनके शेयरधारकों और कर्ज देने वाले वित्तीय संस्थानों के बीच रस्सा कस्सी चल रही है। लैंक्रो इंफ्रा के लिए त्रिवेणी अर्थमूवर्स ने सबसे ज्यादा बोली लगाई थी जिसे बैंक ठुकरा चुके हैं। कंपनी दोबारा प्रस्ताव भेजने की तैयारी में है।

आलोक इंडस्ट्रीज के लिए जेएम फाइनेंसिएल-रिलायंस के प्रस्ताव को भी खारिज किया जा चुका है। एनसीएलटी में कंपनी में जारी दिवालिया प्रक्रिया के खिलाफ भी मामला दायर किया गया है। एबीजी शिपयार्ड को लेकर भी मामला बहुत उत्साहजनक नहीं है। तीन बार प्रस्ताव मंगवाये गये। लिबर्टी हाउस नाम की कंपनी का प्रस्ताव सबसे ज्यादा था लेकिन कंपनी की वित्तीय हालात पर सवाल उठ गये हैं। उक्त तीन कंपनियों के ईरा इंफ्रा, मोनेट इस्पात, अमेटक आटो, ज्योति स्ट्रक्चर्स भी इस सूची में शामिल दूसरी अन्य कंपनियां हैं जिनसे कर्ज वसूली प्रक्रिया जारी है।

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