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सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा, 1575 नाबालिगों के उत्पीड़न मामलों में क्या कार्रवाई हुई


🗒 मंगलवार, अगस्त 14 2018
🖋 विक्रम सिंह यादव, प्रधान संपादक

सुप्रीम कोर्ट ने देश भर के संरक्षण गृहों में बच्चों के यौन उत्पीड़न पर चिंता जताते हुए मंगलवार को केंद्र सरकार से पूछा कि नाबालिगों के उत्पीड़न के 1575 मामलों में क्या कार्रवाई की गई। कोर्ट ने सरकार से बाल संरक्षण नीति बनाने पर भी विचार करने को कहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा, 1575 नाबालिगों के उत्पीड़न मामलों में क्या कार्रवाई हुई

न्यायमूर्ति मदन बी लोकूर की अध्यक्षता वाली पीठ ने मुजफ्फरपुर बालिका संरक्षण गृह कांड मामले में सुनवाई के दौरान केन्द्र सरकार द्वारा पेश किये गए आंकड़े देखने के बाद सरकार से ये सवाल किया। कोर्ट इस मामले में स्वयं संज्ञान लेते हुए सुनवाई कर रहा है।कोर्ट ने रिपोर्ट के आंकड़े देखकर कहा कि देश के विभिन्न संरक्षण गृहों में 1575 बच्चों के साथ यौन या शारीरिक उत्पीड़न के मामले हुए जिसमें 286 बालक हैं। इन मामलों में क्या कार्रवाई हुई। राज्य सरकारों ने इस बारे में क्या कदम उठाए हैं। किन राज्यों ने कार्रवाई नहीं की है। और ये कौन से संरक्षण गृह हैं जहां बच्चों के साथ यौन उत्पीड़न हुआ है।कोर्ट के इन सवालों पर केन्द्र की ओर से पेश एएसजी पिंकी आनंद ने कहा कि केन्द्र ने पिछले वर्ष ही इन मामलों के बारे में राज्यों को अवगत करा दिया था। इस पर पीठ ने सवाल किया कि तब से इनमें हुआ क्या। इस पर एएसजी ने निर्देश लेकर सूचित करने की बात कही। पिंकी आनंद ने कोर्ट को बताया कि राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने संरक्षण गृहों का सोशल आडिट किया है। रिपोर्ट के मुताबिक देश भर के कुल 678 जिलों में सोशल आडिट हुआ है।

कुल 9589 संरक्षण गृह है जहां बच्चे रह रहे हैं। इनमें से 32 फीसद संरक्षण गृह जुविनाइल जस्टिस एक्ट के तहत पंजीकृत हैं। 8744 संरक्षण गृहों का प्रबंधन गैर सरकारी संगठन या निजी व्यक्ति कर रहे हैं जबकि 845 सरकार की मदद से चल रहे हैं। सरकार ने कहा कि सोशल आडिट की ये प्रक्रिया अक्टूबर तक पूरी कर ली जाएगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि इनमें रहने वाले बच्चो में 1575 मामले पोस्को के तहत दर्ज हैं। पीठ ने महिला बाल विकास मंत्रालय से पूछा कि क्या रिपोर्ट तैयार करते समय बच्चों से बात की गई थी। वे रिपोर्ट देखना चाहते हैं जिसमे बच्चों ने बात करते हुए शारीरिक या यौन उत्पीड़न की शिकायत की हो।कोर्ट बच्चों को लेकर चिंतित है वह जानना चाहता है कि बच्चों की स्थिति कैसी है। वे खुश हैं कि नहीं। कोर्ट ने बच्चों के यौन उत्पीड़न पर चिंता जताते हुए सरकार से बाल संरक्षण नीति बनाने पर विचार करने को कहा। कोर्ट ने कहा कि बाल संरक्षण नीति बनाई जाए ताकि अपराध न होना सुनिश्चित हो। अपराध को होने से पहले रोका जा सके। एएसजी ने कहा कि बाल आयोग 3000 से ज्यादा संरक्षण गृहों का पहले ही सोशल आडिट कर चुका है और ज्यादातर राज्यों ने इसकी इजाजत भी दे दी है।

बिहार सरकार से टाटा इंस्टीट्यूट की सोशल आडिट रिपोर्ट कोर्ट में पेश की। कोर्ट ने पूछा कि इसमें ऐसा क्या था जो इसे पहले सार्वजनिक नहीं किया। सरकार ने कहा कि इससे जो लोग शामिल थे उनके बच निकलने की आशंका थी। कोर्ट ने कहा कि सोशल आडिट को सार्वजनिक करे। संरक्षण गृह में बच्चियों की काउंसलिंग कैसे और कौन करेगा ये सरकार तय करे।बिहार सरकार ने कहा कि बच्चों का पुनर्वास किया जा रहा है। उन्हें मनोचिकित्सकों को दिखाया जा रहा है काउंसलिंग हो रही है। कोर्ट ने राज्य से पूछा कि क्या सभी का साथ मिलकर काम करना संभव नहीं है। कोर्ट ने कहा कि बच्चों को आगे कोई नुकसान न हो इसके लिए क्या होना चाहिए।उधर टाटा इंस्टीट्यूट आफ सोशल साइंस (टीआईएसएस) की वकील ने दो रिपोर्ट कोर्ट में पेश की एक में बच्चों के पुनर्वास की योजना दी। कहा उसे तुरंत लागू किये जाने की जरूरत है। दूसरी रिपोर्ट सोशल आडिट कैसे किया जाए इस पर है।टाटा इंस्टीट्यूट के वकील का कहना था कि यहां सवाल ये है कि संरक्षण गृह कितने सुरक्षित हैं। फिलहाल ये सुरक्षित नहीं हैं। टीआईएसएस ने कहा कि बिहार में कुल 110 संरक्षण गृह हैं जिनका छह महीने में सोशल आडिट होना चाहिए। इसमें बाल आश्रम और वृद्धाश्रम दोनों शामिल हैं। कोर्ट ने बिहार से इसी आधार पर सोशल आडिट करने करने को कहा है।

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