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हमारी पुलिस टूटी छत और हिलती बिल्डिंग में रहने को मजबूर , खरीदकर पीना पड़ता है पानी


🗒 गुरुवार, अप्रैल 05 2018
🖋 विक्रम सिंह यादव, प्रधान संपादक

पुलिस वीक के कार्यक्रम में लाइन के मैदान को दुल्हन की तरह सजाया गया, लेकिन इसी जश्न के उजाले के ठीक सामने जवानों की बदहाल बैरकें का अंधेरा ओढ़े हुए हैं। विभाग की रीढ़ कहे जाने वाले पुलिसकर्मी जर्जर आवासों में के आसू बहा रहे हैं।

हमारी पुलिस  टूटी छत और हिलती बिल्डिंग में रहने को मजबूर , खरीदकर पीना पड़ता है पानी

एक ओर पुलिसकर्मियों से साफ सुथरी वर्दी के साथ छवि सुधारने की उम्मीद की जाती है, लेकिन लाइन में उनके साथ रहन-सहन के नाम पर जो अव्यवस्था है उस पर किसी अधिकारी का ध्यान नहीं जा रहा। दैनिक जागरण के संवाददाता ने छायाकार के साथ बुधवार (4 अप्रैल) को पुलिस लाइन का जायजा लिया, तो कई अव्यवस्थाओं से पर्दा उठा। अधिकारियों से अपनी बात भी रखने में लगता है डर

अनुशासन में बंधे पुलिसकर्मी खुलकर अधिकारियों से अपनी बात भी रखने में डरते हैं। संगोष्ठी सदन (जहा अफसर मीटिंग करते हैं) के ठीक बगल कंडम बैरक नंबर सात, आठ, नौ व दस के बाहर प्रस्तावित बहुमंजिला स्थल का दो साल से बोर्ड लगा है, लेकिन बहुमंजिला बिल्डिंग कब बनेंगी इसका जवाब प्रतिसार निरीक्षकों के पास भी नहीं है। अंग्रेजों के जमाने की जर्जर हो चुकी बैरकों में संवाददाता के घुसते ही टूटी छत के नीचे पुलिसकर्मी आराम करते दिखे। यहा दीवारों में जगह-जगह से दरारें थीं और टिन शेड की बनी हुई छत कभी भी गिरने की ओर इशारा कर रही थी। छतों के हुक में कुछ पंखे तो लगे थे, लेकिन खराब थे। खुले तार हादसे हादसे की ओर इशारा कर रहे थे। गंदगी इतनी कि आ जाए उल्टी

गंदगी तो इतनी थी कि मानो सालों से सफाई न हुई हो। बैरकों के बगल बने तीन मंजिला बाथरूम और टॉयलेट में इसकदर बदबू आ रही थी कि कोई भी अंदर घुसने की हिम्मत न जुटा सके। अफसरों की नजर कंडम बैरकों और जर्जर आवासों में रहने वाले पुलिसकर्मियों पर न पड़े इसलिए मैदान के सामने इन्हें बकायदा पर्दो से ढकने का बंदोबस्त किया गया है। चौबीस घटे की सख्त ड्यूटी के बाद जब पुलिसकर्मी बैरक में आराम को जाते हैं तो गर्मी में भी पंखा खराब पड़ा होता है। पुलिस लाइन के जर्जर आवास और जर्जर बैरकों में कभी भी पुलिसकर्मियों के साथ बड़ा हादसा हो सकता है। पुलिसकर्मी ड्यूटी पर जाते हैं, लेकिन उनका मन इस बात से आशकित रहता है कि जर्जर आवासों में परिवार के साथ कोई हादसा न हो जाए।

चार वर्ष पूर्व यहा ब्लॉक नंबर 600 के छज्जे पर खड़ा पुलिसकर्मी का बेटा छज्जे सहित नीचे जा गिरा था। घटना में उसे गंभीर चोटें आईं थीं। यहा छज्जा गिरने से एक मौत भी हो चुकी है।बदहाल बैरकों और जर्जर आवासों को बनवाने के लिए बजट लिखकर दिया गया है। बजट मिलते ही काम शुरू करा दिया जाएगा। फालिस का अटैक, फिर भी जर्जर सीढि़यों से तीन मंजिल का सफर

आवास संख्या 421 के निवासी बुजुर्ग फालोअर अवेधश कुमार मिश्र डंडे के सहारे सीढ़ी चढ़कर तीसरे मंजिल स्थित अपने कमरे में पहुंचने का प्रयास कर रहे थे। उनका बेटा आशीष उन्हें सहारा दे रहा था। यह देख संवाददाता और छायाकार भी उनके पास पहुंचे। जिसपर उन्होंने बताया कि तीन साल पहले फालिस का अटैक पड़ा था। तीन मंजिल से रोजाना सीढि़या चढ़ने और उतरने में ही हालत खराब हो जाती है। पुलिस लाइन में रहने वाले फालोअरों की प8ियों और बच्चों ने बताया कि जर्जर आवासों में हर समय खतरा बना रहता है, कई बार लिखित शिकायत भी की कई, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। मकान संख्या 422 निवासी फालोअर अवधेश की प8ी इंदिला मिश्र ने बताया कि छत का प्लास्टर उखड़कर गिरने से उनके साथ बेटा राजन भी घायल हो गया था।

अस्सी रुपये खर्च करने के बाद मिलता है पानी

पुलिस लाइन के पुलिसकर्मियों ने बताया कि आरओ का पानी पीने के लिए 80 रुपये प्रति महीने खर्च करने होते हैं, इसके एवज में रोजाना बीस लीटर पानी मिलता है, जिसकी रसीद भी मिलती है। इस संबंध में पूर्व डीजीपी विक्त्रम सिंह ने बताया कि पुलिसकर्मियों को नि:शुल्क पीने का पानी मिलना चाहिए, पैसे वसूले जा रहे हैं, यह गलत है।

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