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जिंदा है प्रेमचंद का घीसू, 80 साल बाद भी किसानों के हिस्से में सिर्फ गम


🗒 सोमवार, जनवरी 15 2018
🖋 विक्रम सिंह यादव, प्रधान संपादक

प्रेमचंद के किसान और 2017 के किसान में करीब 80 वर्षो का फासला है, लेकिन समय का यह बड़ा अंतराल भी किसानों की हालत नहीं सुधार सका। प्रेमचंद का किसान घीसू अब भी चारों तरफ है। इस बीच कितनी ही पंचवर्षीय योजनाएं आ गईं, योजना आयोग की नीतियां बन गईं, किसान मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री हो गए, बड़े-बड़े सेमिनार संपन्न हो गए, उनमें वादों की आहुति पड़ गई, हर चुनावी घोषणापत्र में किसानों की बात होती रही, ऋण माफी हो गई, लेकिन घीसू का जन्म भी बार-बार होता रहा। उसके दिन न बहुर सके। किसानों को राजनीति का मोहरा बना दिया गया।

जिंदा है प्रेमचंद का घीसू, 80 साल बाद भी किसानों के हिस्से में सिर्फ गम

पिछले हफ्ते लखनऊ में हुई एक ऐसी ही घटना को किसान की दुर्भाग्य कथा माना जा सकता है। उत्तर प्रदेश की यह घटना देश भर के लिए सबक है। एक दिन अचानक तड़के विधानभवन, मुख्यमंत्री आवास और राजभवन के सामने सड़कों पर आलू पड़ा मिला। सरकार सकते में आ गई और विपक्ष आक्रामक हो गया।उसने फौरन राज्य सरकार पर आलू उत्पादकों के उत्पीड़न का आरोप लगा दिया।जवाब में सरकार ने इसे साजिश बताया और पुलिस को सक्रिय कर दिया।पुलिस ने अपनी पड़ताल की और 13 जनवरी को समाजवादी पार्टी की कन्नौज इकाई के दो नेताओं को गिरफ्तार कर लिया और आठ अन्य को नामजद कर दिया। पुलिस ने अपनी कार्रवाई के प्रमाण में सीसीटीवी फुटेज दिखाए। पुलिस के अनुसार राज्य सरकार को किसान विरोधी दिखाने के लिए समाजवादी पार्टी के कुछ नेताओं ने कन्नौज में यह षड्यंत्र रचा। कोल्ड स्टोरेज से खरीद कर आठ छोटे ट्रकों में आलू लखनऊ लाया गया। रात में ये लोग माल एवेन्यू में ठहरे और फिर मुंह अंधेरे आलू सड़क पर फेंका गया। आलू फेंकने वाले माल एवेन्यू में कहां रुके, यह पुलिस नहीं बता रही।

पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इस घटना पर क्षुब्ध हैं। उनका तर्क है कि लोकतंत्र में विरोध के अनेक तरीके होते हैं और उनमें एक यह भी था। उनकी शिकायत थी कि गिरफ्तार लोगों को अपराधियों की तरह पेश करके पुलिस ने ठीक नहीं किया। यह अपनी तरह का पहला मामला है जिसमें किसानों को इस हद तक मोहरा बनाया गया। पार्टियों में राजनीतिक आरोप प्रत्यारोप आम हैं। जनता भी जानती है इनमें कब कितनी गंभीरता होती है और कितनी शोशेबाजी, लेकिन किसी सरकार के विरोध में एक पूरा प्रहसन रचा जाना इस बात का प्रमाण है कि परस्पर सौहार्द का पतन अब एक ऐसी सड़क पर है जहां से वापसी संभव नहीं। इसलिए तैयार रहिये अगले कुछ महीनों में राजनीति के और भी नाटक देखने को।

019 का लोकसभा चुनाव अहम है। जब दांव पर अपना ही अस्तित्व लगा हो तो राजनीति इसी तरह निम्नस्तरीय हो जाती है। बजाय इसके कि पक्ष-विपक्ष में किसानों की स्थिति सुधारने पर स्वस्थ बहस होती, यहां तो सड़क पर नाटक खेला जाने लगा। सरकार पर कोई आरोप लगा देने से किसानों को उनकी उपज का अच्छा मूल्य कैसे मिल सकता है। सरकार आलू के अच्छे दाम देने का दावा कर रही है तो विपक्ष को उसकी तहकीकात करनी चाहिए थी। किसानों को भी समझ लेना चाहिए कि इसी कारण कृषि आज तक लाभ का व्यवसाय नहीं बन सकी। किसान अगर आढ़तियों और जमाखोरों के बीच पिस रहा है तो कारण यही राजनीति है जो उन्हें खेती के नए तरीके नहीं सिखा सकी, उन्हें हरियाणा, पंजाब के बराबर नहीं खड़ा कर सकी। उन्हें एक ही खेत से कई फसल लेना नहीं सिखा सकी।

यह पहली बार है जबकि उत्तर प्रदेश के पुलिस मुखिया की कुर्सी पंद्रह दिन से खाली है। जिनके नाम की घोषणा हो चुकी, वह अभी तक लखनऊ नहीं पहुंचे हैं। एक चर्चा है कि उनकी फाइल पीएमओ में है। हुआ यह कि उनके नाम की घोषणा पहले हो गई और उसी के साथ उनका प्रस्ताव केंद्र को भेजा गया। कायदे से पहले उनकी कार्यमुक्ति के आग्रह का प्रस्ताव जाना चाहिए था। चर्चा यह भी है कि नियमानुसार प्रस्ताव गृह मंत्रलय को न भेजकर सीधे पीएमओ को भेज दिया गया। यानी बाधा फिर नौकरशाही बनी। या फिर कारण कुछ और है..?

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