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बाबा भीमराव आंबेडकर दलितों के नहीं, हर शोषित-वंचित वर्ग की आवाज थे बाबा साहेब


🗒 शनिवार, अप्रैल 14 2018
🖋 विक्रम सिंह यादव, प्रधान संपादक

संविधान निर्माता और भारत रत्न डॉक्टर भीमराव आंबेडकर की आज (14 अप्रैल) जयंती है। समाज सुधारक, राजनीतिज्ञ व संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर को बाबा साहेब के नाम से भी जाना जाता है।

बाबा भीमराव आंबेडकर दलितों के नहीं, हर शोषित-वंचित वर्ग की आवाज थे बाबा साहेब

भीमराव आंबेडकर आज की राजनीति के ऐसे नायक है, जिसे हर पार्टी 'अपना' बनाना चाहती है। लेकिन बाबा साहेब समाज के वो नायक थे, जो ताउम्र गरीब और वंचित वर्गों की आवाज बने। उन्हें भले ही दलितों का मसीहा माना जाता हो, लेकिन यह भी सच्चाई है कि उन्होंने सिर्फ दलितों की ही नहीं बल्कि समाज के सभी शोषित-वंचित वर्गों के अधिकारों की आवाज उठाई।

बाबा साहेब ने दलित बौद्ध आंदोलन को प्रेरित किया और दलितों के खिलाफ सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध अभियान चलाया। लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं कहा जा सकता है कि आंबेडकर सिर्फ दलितों के थे। उन्होंने समाज के हर उस वंचित वर्ग के अधिकारों की बात की, जिसे समाज में दबाया गया। उन्होंने श्रमिकों और महिलाओं के अधिकारों का समर्थन किया। डॉ. आंबेडकर ने छुआछूत के खिलाफ एक व्यापक आंदोलन चलाया। अछूतों को भी हिंदू मंदिरों में प्रवेश करने का अधिकार दिलाने के लिए लंबे समय तक संघर्ष किया।

डॉ. भीमराव आंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल, 1891 को मध्य प्रदेश के महू गांव में हुआ था। वे रामजी मालोजी सकपाल और भीमाबाई की 14वीं व अंतिम संतान थे। इनके पिता ब्रिटिश भारतीय सेना में काम करते थे। ये महार जाति से ताल्लुक रखते थे, जिसे हिंदू धर्म में अछूत माना जाता था। घर की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण बाबा साहेब का पालन-पोषण बड़ी मुश्किल से हो पाया। इन परिस्थितियों में ये तीन भाई- बलराम, आनंदराव और भीमराव तथा दो बहनें मंजुला और तुलसा ही जीवित बच सके। सभी भाई-बहनों में सिर्फ इन्हें ही उच्च शिक्षा मिल सकी, लेकिन इसके लिए भी उन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ा। अपनी जाति के कारण उन्हें सामाजिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा था। स्कूली पढ़ाई में सक्षम होने के बावजूद छात्र भीमराव को छूआछूत के कारण कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था। स्कूल के सबसे मेधावी छात्रों में गिने जाने के बावजूद इन्हें पानी का गिलास छूने का अधिकार नहीं था, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। बाद में उन्होंने हिंदू धर्म की कुरीतियों को समाप्त करने का जिंदगी भर प्रयास किया।

आर्थिक मुश्किलों के साथ ही बाबा साहेब को हिंदू धर्म की कुरीतियों का भी सामना करना पड़ा। उन्होंने इन कुरीतियों को दूर करने के लिए हमेशा प्रयास किया। लेकिन तमाम प्रयासों के बाद जब उन्हें लगा कि वे हिंदू धर्म की कुरीतियों को नहीं मिटा पाएंगे, तो उन्होंने 14 अक्टूबर, 1956 में अपने लाखों समर्थकों सहित बौद्ध धर्म अपना लिया।

डॉ. भीमराव आंबेडकरकी पहली शादी 9 साल की उम्र में ही हो गई थी, उनका पत्नी का नाम रमाबाई था। रमाबाई की मौत के बाद उन्होंने सविता से शादी कर ली। वे ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखती थीं। सविता ने भी इनके साथ ही बौद्ध धर्म अपना लिया था। आंबेडकरकी दूसरी पत्नी सविता का निधन वर्ष 2003 में हुआ।

आंबेडकरकी गिनती दुनिया के सबसे मेधावी व्यक्तियों में होती थी। वे 9 भाषाओं के जानकार थे। उन्हें देश-विदेश के कई विश्वविद्यालयों से पीएचडी की कई मानद उपाधियां मिली थीं। इनके पास कुल 32 डिग्रियां थीं। यही वजह है कि आंबेडकर को प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भारत का पहला कानून मंत्री बनाया था।

15 अगस्त, 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस के नेतृत्व वाली नई सरकार अस्तित्व मे आई, तो उसने आंबेडकर को देश का पहले कानून मंत्री के रूप में सेवा करने के लिए आमंत्रित किया, जिसे उन्होंने स्वीकार किया। देश के पहले संविधान के निर्माण के लिए उन्हें 29 अगस्त, 1947 को संविधान की प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाया गया। फिर दो वर्ष, 11 माह, 18 दिन के बाद संविधान बनकर तैयार हुआ। 26 नवंबर, 1949 को इसे अपनाया गया और 26 जनवरी, 1950 को लागू कर दिया गया।

एनडीए सरकार के अस्तिव के आने के बाद समान नागरिक संहित की आवाज कई बार उठी। लेकिन वास्तव में बाबा साहेब भी समान नागरिक संहिता के पक्षधर थे और कश्मीर के मामले में धारा 370 का विरोध करते थे।

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