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अभी भी मनरेगा में कहां अनियमितता, नहीं जानते उपायुक्त


🗒 शुक्रवार, अप्रैल 27 2018
🖋 विक्रम सिंह यादव, प्रधान संपादक

मनरेगा के तहत हुए कार्यो में कहां अनियमितता हुई है यह विभाग के मुखिया को ही नहीं पता है। सोशल ऑडिट साल में एक बार होती है, उसमें अनियमितता मिली या नहीं यह भी मनरेगा के उपायुक्त एके दीक्षित नहीं जानते। उन्हें सिर्फ इतना पता है कि वित्तीय वर्ष 2017-18 में 28051 परिवारों को रोजगार दिया गया और इनमें 76 परिवार भाग्यशाली रहे जिन्हें सौ दिन का रोजगार मिला। जन सूचना अधिकार अधिनियम (आरटीआइ) के तहत मांगी गई सूचनाओं में भी उन्होंने गोलमोल जवाब दिया।

अभी भी मनरेगा में कहां अनियमितता, नहीं जानते उपायुक्त

मनरेगा का शुभारंभ इसलिए हुआ था कि लोगों को गांव में ही रोजगार मिल जाए, लेकिन योजना लक्ष्य से भटक गई है। जिले में 1,92,443 परिवारों के जॉबकार्ड बने हैं, लेकिन पिछले साल रोजगार सिर्फ 28051 परिवारों को मिला। यह आंकड़ा साबित करता है कि गांवों में रोजगार का सृजन ही नहीं हो पा रहा है। ग्राम प्रधान और विकास विभाग के अफसर इसमें रुचि नहीं ले रहे हैं। इसकी बड़ी वजह है कार्यो की ऑनलाइन मॉनीट¨रग। प्रत्येक कार्य की फोटो, कार्यस्थल का विवरण आदि ऑनलाइन है, ऐसे में कार्यो में फर्जीवाड़ा अब आसान नहीं रहा। एक कार्य पर कई बार भुगतान संभव नहीं है, ऐसे में प्रधान भी रुचि नहीं ले रहे हैं। शिकायतों की जांच कराना और दोषी पर कार्रवाई सुनिश्चित करना उपायुक्त मनरेगा की जिम्मेदारी है, लेकिन आरटीआइ के तहत जब उनसे अनियमितता और कार्रवाई के बारे में जानकारी मांगी गई तो उन्होंने कहा कि जिला विकास अधिकारी के माध्यम से सोशल ऑडिट कराई जाती है। अब सवाल यह है कि अगर ऑडिट में अनियमितता मिली या नहीं उन्हें इसकी जानकारी नहीं है। कार्यो को लेकर शिकायतें जो आई हैं उनकी जानकारी देने के बजाय उन्होंने छिपा लिया।

योजना आरंभ से अब तक कितनी धनराशि मिली और कितनी खर्च हुई इसकी जानकारी भी उनके पास नहीं है। प्रश्न के जवाब में उन्होंने बताया कि धन आवंटन शासन से सीधे जनपद को नहीं होता। अनियमितता या गबन के आरोप में कितने लोगों पर कार्रवाई हुई यह भी उन्होंने नहीं बताया।

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