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विज्ञान और चिकित्सा के साथ संस्कृत में घुली अपनी राजभाषा


🗒 शुक्रवार, सितंबर 14 2018
🖋 विक्रम सिंह यादव, प्रधान संपादक

 हिंदी महज भाषा नहीं, हिंदुस्तान की गौरव गाथा है। देश के कण-कण में बसी एक कालजयी परिभाषा है। फारसी, अरबी और उर्दू से लेकर आधुनिक अंग्रेजी को भी इसने आत्मीयता से अपनाया है। संवाद का सरल और सहज माध्यम है। शहर में कई ऐसे लोग हैं, जो निज भाषा में काम संग जन-जन तक जानकारियां पहुंचा रहे हैं। इनके लिए विज्ञान और चिकित्सा के साथ संस्कृत में घुली राजभाषा शान और पहचान है।

विज्ञान और चिकित्सा के साथ संस्कृत में घुली अपनी राजभाषा

विद्यांत हिंदी पीजी कॉलेज के संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ. विजय कर्ण बताते है कि पौधों का रोपण होता है, इसलिए वृक्षारोपण नहीं पौधरोपण शब्द सही है। शव तैर नहीं सकता इसलिए इसके साथ उतराता मिला का प्रयोग ठीक होगा। अक्सर स्त्री के साथ प्राचार्या शब्द का प्रयोग देखते हैं, यह ठीक नहीं। पद यथावत रहता है। लिहाजा प्राचार्य ही लिखना चाहिए, डॉ. विजय कर्ण का तमाम सुधारात्मक बिंदुओं के साथ वर्तनी पर जोर रहता है। संस्कृत के साथ ही हंिदूी के प्रचार-प्रसार संग अपनी संस्कृति से जुड़ाव इनका मूलमंत्र है। इनकी किताबें दक्षिण भारत के कई राज्यों में कई कक्षाओं के पाठ्यक्रम में शामिल हैं। साथ ही डॉ. कर्ण नगर भाषा क्रियांवयन समिति से भी जुड़े हैं। व्याकरण दर्शन विमर्श: उप्र संस्कृत संस्थान के अलावा सेमी कंडक्टर शब्दावली : वैज्ञानिक तकनीकी शब्दावली आयोग, भारत सरकार, रिजर्व बैंक शब्दावली : वैज्ञानिक तकनीकी शब्दावली आयोग, भारत सरकार, प्रसार भारती शब्दावली : वैज्ञानिक तकनीकी शब्दावली आयोग, भारत सरकार जैसी पुस्तकों का अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद कर चुके हैं। कुछ पुस्तकों का संस्कृत में अनुवाद किया है।

डॉ. चंद्र मोहन नौटियाल, कार्यक्रम परामर्शदाता, विज्ञान संचार, भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी, दिल्लीशहर के बीरबल साहनी पुरावनस्पति विज्ञान संस्थान के पूर्व वैज्ञानिक डॉ. चंद्र मोहन नौटियाल विज्ञान की जटिलतम गुत्थियों को सरल हिंदी में सहजता के साथ समझाने में माहिर हैं। जुलाई 2016 में संस्थान से रेडियो कार्बन प्रयोगशाला के प्रमुख के पद से अवकाश प्राप्त किया। वहां 15 वर्ष से अधिक राजभाषा कार्यान्वयन समिति का कार्य भी देखा। इस दौरान हिंदी के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए करीब 50 कार्यशालाएं कीं। रेडियो तथा टेलीविजन के लिए हिंदी वार्ताएं, साक्षात्कार, कविताएं, नाटक, विज्ञान कार्यक्रम लिखे। उप्र और उत्तराखंड के अलावा अन्य प्रदेशों में हिंदी में सैकड़ों व्याख्यान देकर विज्ञान का प्रचार-प्रसार किया। सम्मान: 1997 और 2013 में विज्ञान परिषद, प्रयाग ने विज्ञान वाचस्पति तथा शताब्दी सम्मान दिए। 2017 में हिंदी साहित्य विभूषण का सम्मान मिला।डॉ. एके अग्रवाल, विवेकानंद पॉली क्लीनिक एंड इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस ने बताया कि फिजिकल मेडिसिन एवं रिहैबिलिटेशन, केजीएमयू के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. एके अग्रवाल विभिन्न मेडिकल कॉलेजों में हिंदी में लेख और पुस्तकें आदि लिखने के लिए कार्यशाला का आयोजन करते हैं। खुद भी कई किताबें लिखीं हैं, जिनमें पांच पुस्तकें हिंदी में प्रकाशित हो चुकी हैं। इनमें 'पोलियो : मार्ग दर्शिक', 'कुष्ठ रोग : मार्ग दर्शिका', 'पेराप्लीजिया के रोगी में गुर्दे, मूत्रशय तथा मूत्रवाहिनी के रोगों से बचाव', 'प्रोस्थेटिक एवं आथरेटिक' और 'प्रेरक लघु कथाएं' शामिल हैं। मार्च 2018 में पोस्ट पोलियो सिंड्रोम पर केंद्रित किताब कल के लिए दिव्यांगों की संपूर्ण पत्रिका 'रोशनी की मीनारें' आई। डॉ. अग्रवाल बताते हैं, मां से हिंदी में लिखने और काम की प्रेरणा मिली।डॉ. मधुसूदन 'पाराशर' उपाध्याय, वैज्ञानिक अधिकारी, बायोटेक पार्क के अनुसार, आणविक जीव विज्ञान में पीएचडी धारी डॉ. मधुसूदन क्लिष्ट विज्ञान संबंधीविषयों जैव प्रौद्योगिकी, जीन अभियांत्रिकी, अंतरिक्ष विज्ञान आदि की सुगम, सरल और सहज व्याख्या में यकीन रखते हैं। अब तक विज्ञान आधारित एक दर्जन पुस्तकें आ चुकी हैं, जिनमें आठ हिंदी में हैं। 15 शोध पत्र हिंदी में प्रकाशित हो चुके हैं। सोशल मीडिया पर हिंदी के जरिए विज्ञान जागरूकता में विशेष सक्रियता है। लुप्त होते परंपरागत ज्ञान और प्राचीन शास्त्रों में उपलब्ध वैज्ञानिक तथ्यों को जनसामान्य 'निज भाषा' में पहुंचाने का प्रयास खास है। डॉ. मधुसूदन बताते हैं, विज्ञान कविताओं पर एक पुस्तक और विज्ञान एकांकी शीघ्र प्रकाशित होने वाली है।

साहित्यकार नवनीत मिश्र बताते हैं, हर हिंदी दिवस पर हम हिंदी के दुश्मनों को पैदा कर रहे हैं।  राजभाषा अधिनियम की धारा में लिखा है कि जब तक भारत का एक भी  राज्य किसी भाषा के राष्ट्रभाषा के विरोध में होगा, वह भाषा  वास्तविक राष्ट्रभाषा नहीं बन सकती है। इसके लिए हमें तीन भाषा फार्मूला अपनाना होगा। जिसके अंतर्गत देश भर में पाठ्यक्रम में हिंदी के साथ एक क्षेत्रीय भाषा और एक विदेशी भाषा को अनिवार्य किया  जाए। तब जाकर अन्य प्रदेशों के साथ भाषा का आदान-प्रदान हो सके गा, साथ ही हिंदी के प्रति उनका नजरिया भी बदला जा सकता है। आज हिंदी वाले राज्य में ही हिंदी भाषा का विरोध हो रहा है।हिंदी  बोलने वालों को गंवार समझा जाता है, उन्हेंं सभ्य समाज का हिस्सा  नहीं मानते हैं। सबसे पहले हमें हिंदी के प्रति अपनी मानसिकता को बदलना होगा।गायक व  लेखक डॉ. हरिओम के मुताबिक, हम किसी पर जबरदस्ती अपनी भाषा थोप नहीं सकते हैं, संविधान भी  इसकी इजाजत नहीं देता। इसलिए भाषा का आदान-प्रदान करना चाहिए। हम  दूसरी भाषाओं का सम्मान करेंगे तो दूसरे भी हमारी भाषा को सम्मान की नजर से देखेंगे। हिंदी भाषा को आम बोलचाल की भाषा का वि कसित करना होगा। हिंदी भाषा को इतना समृद्ध करना चाहिए कि सभी को इसकी उपयोगिता का ज्ञान हो जाए। आज भारत के अधिकतर लोग ङ्क्ष हदी भाषा का प्रयोग करते हैं। यह सबसे महत्वपूर्ण जनसंपर्क भाषा  है। हमें हिंदी भाषा को कृत्रिम भाषा बनने से रोकना होगा। सरल  शब्दों का प्रयोग करें। इसके साथ ही तकनीक की सारी किताबों का हिंदी में सरल शब्दों में अनुवाद होना चाहिए। सरकारी महकमों  में भी हिंदी के कठिन शब्दों का प्रयोग बंद करके उनके सरल शब्द  प्रयोग में लाने होंगे।

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