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जहां बारिश न होंने पर सूखा,बारिश होने पर आती है बाढ़, बाढ़ बचाव और तटबंधों की सुरक्षा पर विशेष


🗒 सोमवार, जुलाई 17 2017
🖋 आशीष ओमर, रिपोर्टर फतेहपुर

UFH NEWS FATEHPUR 

जहां बारिश न होंने पर सूखा,बारिश होने पर आती है बाढ़, बाढ़ बचाव और तटबंधों की सुरक्षा पर विशेष

                                      एक समय था जब बरसात अधिक होती थी तो नदियों में बाढ़ आ जाती थी।धीरे धीरे बरसात कम होने लगी और नदियों में बरसाती पानी से बाढ़ आना बंद हो गया है।कल्याणी गोमती जैसी तमाम नदियों में पिछले कई दशकों से बाढ़ नहीं आयी है। एक मात्र घाघरा व सरयू ऐसी नदी हैं जिसमें पिछले तीन दशकों से हर साल बरसात के मौसम में बाढ़ आ जाती है और तराई के लोगों को दाने दाने का मोहताज बना देती हैं।घाघरा में कभी बाढ़ भारी बरसात होने से नहीं आती है बल्कि जब भी नेपाल के बनबसा बाँध का पानी इसमें छोड़ दिया जाता है तभी बाढ़ आ जाती है।

                                        अगर बनबसा बाँध का पानी घाघरा में न छोड़ा जाय तो नेपाल में तबाही आ सकती है।इस तबाही से बचने को नेपाल और भारत के मध्य पानी छोड़ने का समझौता है जिसके चलते हर साल हमारे यहाँ पर कृत्रिम बाढ़ आ जाती है। इस समय हजारों लोग बाढ़ विभीषिका से जूझ रहे हैं और सरकार इन्हें बचाने में परेशान है।हर साल आने वाली इस कृत्रिम बाढ़ से लोगों को बचाने के लिये सरकार द्वारा करोड़ों अरबों खर्च करके तटबंधों का निर्माण कराया गया है।इन तटबंधों की मरम्मत पर हर साल सरकार करोड़ों रूपये खर्च करती है इसके बावजूद तटबंध टूट जाते हैं और सैलाब से जनमानस तबाह होने लगता है।यह सवाल कोई पूँछने वाला नहीं है कि जब तटबंधों की हर साल मरम्मत होती है तो यह कैसे टूट जाते हैं? इन तटबंधों की मरम्मत बरसात से पहले ही क्यों नहीं कर ली जाती है।

                                      असलियत तो यह है कि यह तटबंध लोगों को तबाही से बचाने के लिये नहीं बल्कि हरामखोरी करने के लिये बनाये गये हैं। यह तटबंध हरामखोरी करने के माध्यम बन गये हैं।अभी सरकार ने भी माना है कि तटबंधों के नाम पर अरबों का घोटाला किया गया है।गरीब बाढ़ पीड़ितों के बचाव के लिये आये धन को खाना गरीबों का खून पीने जैसा है।बाढ़ पीड़ित भले ही ईश्वर से बाढ़ न आने की कामना करते हो लेकिन अधिकारी और राजनेता दोनों बाढ़ आने की मिन्नतें किया करते हैं।इस समय बाढ़ से हाहाकार मचा हुआ है और सारी सरकारी मशीनरी बाढ़ पीड़ितों को बचाने और उनकी सहायता करने में जुटी है।

                                     सरकार ने बाढ़ समस्या के स्थाई निदान की दिशा में कदम बढ़ाया है।इस कृत्रिम बाढ़ से हर साल सरकार को अरबों का झटका लगता है और हर साल बाढ़ के नाम अच्छी भली रकम बाढ़ बचाव के नाम पर चली जाती है।बाढ़ के नाम पर चल रही हरामखोरी समाप्त होनी चाहिए क्योंकि सरकारी खजाने पर जो भी बोझ पड़ता है उसकी भरपाई जनता को करनी पड़ती है। 

संवाददाता आशीष ओमर 

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