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कुछ और भी सियासी हित साध रही भाजपा के राज्यसभा उम्मीदवारों की घोषणा


🗒 रविवार, मार्च 11 2018
🖋 विक्रम सिंह यादव, प्रधान संपादक

भाजपा ने राज्यसभा के लिये रविवार शाम उत्तर प्रदेश कोटे से सात उम्मीदवारों की घोषणा कर 2019 के लोकसभा चुनाव को साधने की पहल की है।  इसमें सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले पर जोर दिया गया है।

कुछ और भी सियासी हित साध रही भाजपा के राज्यसभा उम्मीदवारों की घोषणा

जातीय और क्षेत्रीय समीकरण के साथ-साथ विरोधियों को दांव देने की भी रणनीति अपनाई गई है।भाजपा ने 40 वर्ष तक समाजवादी रहे पूर्व मंत्री अशोक बाजपेयी को उम्मीदवार बनाया है। पिछले वर्ष अशोक बाजपेयी विधान परिषद की सदस्यता से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हुए थे। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य समेत मंत्रिमंडल के पांच सदस्य विधान मंडल के किसी सदन के सदस्य नहीं थे। इस इस्तीफे से उनकी राह आसानी हुई थी। अशोक बाजपेयी के त्याग का भाजपा ने रिटर्न गिफ्ट दिया है। इसके साथ ही एक तीर से कई निशाने साधे हैं। बाजपेयी के जरिये ब्राह्मण समीकरण साधा गया है तो सपा में प्रभावी नरेश अग्रवाल के धुर विरोधी अशोक को तरजीह भी दी गई है। हरदोई निवासी बाजपेयी की कान्यकुब्ज ब्राह्मणों में अच्छी पकड़ है। 

विजय पाल सिंह तोमर को उम्मीदवार बनाकर भाजपा ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश को महत्व देने के साथ ठाकुर समीकरण पर जोर दिया है। तोमर किसान मोर्चे के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे हैं। इस वजह से किसानों का भी पार्टी ने मान बढ़ाया है। हाल में मेरठ नगर निगम में महापौर का चुनाव हार चुकीं भाजपा की प्रदेश उपाध्यक्ष कांता कर्दम दलित फैक्टर को मजबूत करेंगी। इसके साथ ही संगठन और महिला का भी प्रतिनिधित्व होगा। भाजपा ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश को इस सूची में काफी महत्व दिया है। एक और उम्मीदवार हरनाथ सिंह यादव भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं।

भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में पिछड़ों को लुभाने पर जोर दिया और नतीजा बेहतर रहा। पर, 2014 और 2017 के चुनावों में यादव बिरादरी पर भाजपा की मजबूत पकड़ नहीं बन सकी। उत्तर प्रदेश में मुख्य प्रतिद्वंद्वी समाजवादी पार्टी को दांव देने के लिये पूर्व एमएलसी हरनाथ सिंह यादव को भाजपा ने उम्मीदवार बनाया है। कल्याण सिंह के समय भाजपा के प्रदेश महामंत्री रहे हरनाथ सिंह कुछ समय तक समाजवादी पार्टी में रह चुके हैं। 2019 के चुनाव के पहले भाजपा ने युवा मोर्चे की कमान भी यादव बिरादरी के सुभाष यदुवंश को दी है। माना जा रहा है कि आगे भी कुछ और यादवों को महत्व मिलेगा। 

पूर्वांचल का संतुलन, राजभर को महत्व

भाजपा सरकार के लिये योगी सरकार के मंत्री और सहयोगी दल सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर मुसीबत खड़ी करते रहे हैं। पार्टी ने बलिया जिले के कार्यकर्ता सकलदीप राजभर को मौका देकर पिछड़ों को लुभाने के साथ ही राजभर बिरादरी में मजबूत पकड़ बनाने की पहल की है। इसके साथ ही पूर्वांचल का संतुलन बनाया गया है। ओमप्रकाश राजभर का गाजीपुर, बलिया, मऊ समेत कुछ जिलों में प्रभाव है। इस फैसले से राजभर बिरादरी में भाजपा ने अपनापन का संदेश दिया है। 

राष्ट्रीय कोटे का भी ख्याल 

वैश्य समाज के डॉ. अनिल जैन भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव होने के साथ ही अमित शाह के करीबी माने जाते हैं। जैन भी उप्र के ही निवासी हैं। जैन के अलावा मोदी के करीबी और भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हा राव को मौका देकर राष्ट्रीय कोटे का भी ख्याल रखा गया है। भाजपा ने केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली को पहले ही उम्मीदवार घोषित कर दिया था। प्रत्याशियों के चयन में यह माना जा रहा था कि दूसरे राज्यों के लोगों को भी अवसर मिल सकता है लेकिन, एक-दो को छोड़कर भाजपा ने उप्र के लोगों को ही मौका दिया है। 

आखिर तक तक भाजपा के रुख पर नजर

भाजपा ने राज्यसभा के लिये कुल आठ उम्मीदवार दिये हैं। विधायकों द्वारा इन उम्मीदवारों का चयन होना है। भाजपा के सहयोगी अपना दल और सुभासपा समेत कुल 325 विधायक हैं, जबकि सपा के पास 47, बसपा के पास 19 और कांग्रेस के पास सात विधायक हैं। राज्यसभा के एक उम्मीदवार को जीतने के लिये 37 विधायकों के वोट की जरूरत है। इस हिसाब से भाजपा के आठ, सपा के एक उम्मीदवार को आसानी से चुना जाना तय है। पर, दसवें उम्मीदवार के लिये किसी के पास स्पष्ट बहुमत नहीं है। भाजपा के पास 28 विधायकों के वोट बच रहे हैं। ऐसे में सवाल यह है कि सोमवार को होने वाले नामांकन में भाजपा किसी निर्दलीय पर दांव लगाएगी या फिर निर्विरोध निर्वाचन को प्राथमिकता देगी।  गुजरात के राज्यसभा चुनाव से भाजपा फूंक-फूंक कर कदम रख रही है, इसलिए भी संभव है कि वह बिना किसी अवरोध के निर्विरोध चुनाव संपन्न करा दे। फिलहाल सोमवार को नामांकन के अंतिम समय तक नजरें उसके रुख पर रहेंगी। 

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