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कर्नाटक में योगी आदित्‍यनाथ के सहारे पार उतरने की कोशिश कर रही भाजपा!


🗒 सोमवार, मार्च 12 2018
🖋 विक्रम सिंह यादव, प्रधान संपादक

उत्तर पूर्व में भगवा लहराने के बाद अब भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती कर्नाटक को जीतने की है। यहां पर सिद्दारमैया के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार है। इससे पहले यहां पर भाजपा की सरकार थी, लेकिन 2013 में येदियुरप्‍पा क्‍योंकि भाजपा से अलग थे

कर्नाटक में योगी आदित्‍यनाथ के सहारे पार उतरने की कोशिश कर रही भाजपा!

इस लिए पार्टी को वहां पर हार का सामना करना पड़ा था। लेकिन अब वह दोबारा पार्टी में आ चुके हैं और पार्टी के लिए वह आज भी बड़ा चेहरा और नेता है। आपको बता दें त्रिपुरा में भाजपा ने 25 वर्ष पुरानी लेफ्ट सरकार को हटाकर अपनी सरकार बनाई है। यहां पर हुई जीत में एक अहम भूमिका यूपी के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी निभाई थी। ऐसा इसलिए क्‍योंकि यहां पर नाथ संप्रदाय को मानने वाले लोगों की तादाद काफी है और नाथ संप्रदाय के प्रमुख योगी आदित्‍यनाथ हैं। भाजपा के लिए वह यहां सफल कौड़ी साबित हुए हैं। अब यही सब कुछ भाजपा कर्नाटक में भी दोहरा रही है।

आपको यह सुनकर जरूर कुछ हैरत हुई होगी लेकिन यह सच है। यही वजह है कि योगी ने यहां पर पिछले सप्‍ताह एक रैली को भी संबोधित किया था। कहा जा सकता है कि भाजपा ने यहां पर अपने चुनावी कैंपेन की तैयारी शुरू कर दी है। कर्नाटक के तटीय इलाके में हुई यह रैली भाजपा के लिए काफी खास थी। खास इसलिए क्‍योंकि यहां का भी नाथ संप्रदाय के साथ कनेक्‍शन है। यहां के कद्री मठ और नाथ संप्रदाय के बीच बड़ा गहरा संबंध है। करीब दो वर्ष पहले यहां के महंत को पद दिलाने में योगी ने उनकी काफी मदद की थी।

आपको यहां पर बता दें कि आदि चुंचांगिरी मठ मैसूर में सबसे पुराना मठ है। इस बार इस मठ की भी कर्नाटक के चुनाव में अहम भूमिका होने वाली है। दरअसल, नाथ संप्रदाय के गोरखनाथ ने 12वीं सदी में पूरे देश का भ्रमण किया था। कर्नाटक की यदि बात की जाए तो यहां पर वह न सिर्फ रुके थे बल्कि यहां पर उन्‍होंने दीक्षा भी दी थीं। इसकी बदौलत यहां पर नाथ संप्रदाय पनपा था जिसको नवनाथ संप्रदाय भी कहा जाता है। अपने यहां प्रवास के दौरान उन्‍होंने कई मठ यहां के तटीय इलाकों में स्‍थापित किए। इनमें से ही एक था कद्री मठ। पिछले दिनों आदित्‍यनाथ और भाजपा अध्‍यक्ष अमित शाह मठ आए थे।

भाजपा दरअसल इसके आसरे लिंगायत समुदाय पर अपनी नजर गड़ाए हुए है। येदियुरप्‍पा भी इसी समुदाय से आते हैं। भाजपा कर्नाटक के उत्‍तरी क्षेत्र में अपनी पैंठ मजबूत करने में जुटी है। कभी यह इलाको बॉम्‍बे प्रेसिडेंसी के अंतर्गत आता था। लेकिन देश के आजाद होने के बाद कर्नाटक में चला गया था। यूं भी इस पूरे इलाके में आरएसएस और भाजपा काफी मजबूत दावेदार है। लेकिन यदि बात की जाए पुराने कर्नाटक की तो, यहां पर पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा के नेतृत्व वाली जनता दल एस और कुछ जगहों पर कांग्रेस का दबदबा है।

जिस तरह से राज्‍य के सीएम सिद्दारमैया यहां के लिंगायत समुदाय में अपनी पैंठ बना रहे हैं ठीक वैसे ही भाजपा वोकलिंगा समुदाय में अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रही है। कर्नाटक की चुनावी राजनीति की यदि बात की जाए तो यहां पर योगी आदित्‍यनाथ का कद यूपी के सीएम बनने के बाद और बढ़ गया है। इतना ही नहीं यहां पर योगी आदित्‍यनाथ की बायोग्राफी की भी अच्‍छी खासी मांग है। 19 मार्च को योगी आदित्‍यनाथ एक बार फिर से यहां पर आने वाले है। वह यहां पर सूरतकाल, जो कि तटीय इलाका है में एक रैली को संबोधित करेंगे।

कर्नाटक जीतना भाजपा के लिए इस लिहाज से भी जरूरी है क्‍योंकि यहां से ही भाजपा के लिए दक्षिण का रास्‍ता खुला था। कर्नाटक दक्षिण भारत का वह पहला राज्‍य है जहां पर भाजपा पूर्व में येदियुरप्‍पा के नेतृत्‍व में सरकार बना चुकी है। इस बार भी येदियुरप्‍पा ही उसके लिए बड़ा चेहरा और पार्टी के मुख्‍यमंत्री उम्मीद्वार हैं। लेकिन जहां तक योगी आदित्‍यनाथ की बात है तो वह यहां पर भी अपना कमाल दिखाने के लिए पूरी तरह से तैयार दिखाई देते हैं। उत्तर पूर्व में योगी त्रिपुरा के लिए स्‍टार कैंपेन थे। कर्नाटक में भी इस बार के चुनाव में उनकी अहम भूमिका होगी। पिछली बार के मुकाबले यहां पर पार्टी इसलिए भी मजबूत है क्‍योंकि इस बार पार्टी के सामने कोई विवाद नहीं है जैसा पिछली बार येदियुरप्‍पा के पार्टी से बाहर जाने के बाद हुआ था। इसके अलावा राज्य में येदियुरप्‍पा की छवि बेहतर है।

कर्नाटक चुनाव में कांग्रेस को मात देना कुछ मुश्किल भले ही दिखाई देता हो लेकिन यह नामुमकिन बिल्‍कुल नहीं है। प्रदीप का कहना था की बीते चार वर्षों में भाजपा ने जहां मजबूती हासिल की है वहीं विभिन्न राज्यों में मौजूद क्षेत्रीय दल लगातार कमजोर होते गए हैं, फिर चाहे सपा हो या बसपा हो, जिसका अब यूपी में कोई वजूद नहीं रह गया है। इसके अलावा DMK, AIADMK हो या और दूसरी क्षेत्रीय पार्टियां हों, सभी कमजोर हुए हैं। ये दल आज अपने वजूद को बचाने की ही कवायद कर रहे हैं, जिसमे कांग्रेस भी शामिल है। लिहाजा आज के दौर में विपक्ष भाजपा को टक्कर दे पाने की स्थिति में नहीं है।

इन सभी के बीच भाजपा जहां कांग्रेस को शिकस्‍त देने की तैयारी कर रही है वहीं कांग्रेस की ओर से सिद्दारमैया लगातार जीत की कोशिशों को धार देने में लगे हुए हैं। यही वजह है कि पिछले दिनों उन्‍होंने कर्नाटक के लिए अलग झंडे का प्रस्‍ताव असेंबली में पास करवाकर एक भावनात्‍मक कार्ड खेला है।

 

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