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शहर मे गली से लेकर होटलों तक शहर के कोने कोने मे बिछी है विसाते


🗒 गुरुवार, नवंबर 08 2018
🖋 चित्रभान केशव अग्निहोत्री, ब्यूरो प्रमुख कानपुर

गली से लेकर होटल के रूम और होस्टल तक सजी हुई है जुए की बुक

शहर मे गली से लेकर होटलों तक शहर के कोने कोने मे बिछी है विसाते

05 नवंबर 2018 (सूरज वर्मा). दिवाली का त्यौहार शुरू होते ही जिले में जुए का बाजार गुलजार हो चुका है। नोटों की चमक और सिक्कों की खनक से हर तरफ खुशियों का माहौल बनता जा रहा है। बीते 1 हफ्ते के अंदर आधा दर्जन जुए की बुक पकड़ी जा चुकी हैं, वह भी जिले के चार अलग-अलग इलाकों में। आरोप है कि ज्यादातर जुआ पुलिस के संरक्षण में चल रहा है।जानकारी के अनुसार जिले में बहुत बड़े पैमाने पर जुए की बुक चल रही हैं, जिस तक पहुंच पाना बहुत ही मुश्किल हो चुका है। शहर में सबसे ज्यादा ‘कट’ के जुए की बुक लगती है, इस गेम में एक बार में लाखों रुपए का दांव लगाया जा सकता है। वहीं अन्य गेम में धीरे धीरे दांव में पैसा बढ़ता जाता है। जुए की बुक में ज्यादातर पेशेवरा जुआरी खेलते हैं इसमें से कुछ जुआरी जुए की सारी बाजी जान लेते हैं इसके बाद वे जीतने के लिए बेमानी करने लगते हैं। शहर में घने इलाके से लेकर पॉश इलाकों तक में इन दिनों जुए की बुक चल रही हैं।जुए की बुक चलाने वाले शातिर किराए का मकान यूज करते हैं इसके अलावा कई होटल और हॉस्टल में भी जुआ बड़े पैमाने पर खेला जा रहा है। कुछ शातिर अपने घर पर ही जुआ की फड़ चलवाते हैं, सूत्रों की माने तो कानपुर शहर में ज्यादातर जुआ सफेदपोश और रसूखदार लोग ही खिलवा रहे हैं, जिस तक पहुंच पाना पुलिस के लिए बहुत मुश्किल प्रतीत होता है। वैसे पुलिस न चाहे तो रोड़ पर एक ठेला भी नहीं लग सकता है, तो शहर में प्रतिदिन के हिसाब से करोड़ों का जुआ कैसे चल रहा है ?

एक आंकलन के अनुसार शहर में प्रतिदिन करीब एक करोड़ रुपये का जुआ खेला जा रहा है। एक दर्जन से अधिक स्थान जुए के अड्डे के रूप में अपनी स्‍थायी पहचान बना चुके हैं। इनमें से कई रिहाइशी इलाके में हैं, जहां जुआरियों की रात-दिन की धमाचौकड़ी से आसपास का जनजीवन प्रभावित हो रहा है। स्थानीय लोगों द्वारा वरिष्‍ठ पुलिस अधिकारियों तक को इसकी सूचना कई बार दी गई है, पर पुलिस की ओर से इस अवैध कारोबार के खिलाफ हाल-फिलहाल कोई सख्‍त कार्रवाई नहीं की गई है जिसके चलते पुलिस की भूमिका भी संदिग्ध बनी हुई है।जानकारी के अनुसार दीपावली के समय जुए का खेल चरम पर होता है, सुरक्षित और संरक्षित अड्डों पर 50 से 90 लाख रुपये प्रतिदिन का खेल होता है, जबकि छोटे अड्डों पर एक से पांच लाख रुपये का खेल चलता है। इनमें से अधिकतर अड्डे दुर्गापूजा के वक्त शुरू हुए थे जो अब तक जारी हैं।

हमारे विश्‍वस्‍त सूत्रों के अनुसार शहर के बीच स्थित एक पॉश इलाके में चल रहे जुए के अड्डे शाम ढलते ही गुलजार हो उठते हैं। शराब एवं कबाब का यहां भरपूर इंतजाम रहता है, जबकि खास मौकों पर 'शबाब' भी उपलब्‍ध कराया जाता है। इन जुआरियों में इलाके के छंटे हुए बदमाश भी होते हैं और कुछ सफेदपोश भी। कुछ आसपास के लोग व कुछ पुलिस वालों का भी यहां आना-जाना लगा रहता है। सूत्रों के अनुसार यहां जुए का धंधा चलाने में कुछ पुलिस वाले भी शामिल हैं। लोग तो यह भी कहते हैं की पुलिसिया कार्रवाई ना हो इसके लिये प्रतिमाह कई लाख की भेंट चढ़ाई जाती है। स्‍थानीय लोगों की माने तो मतैया नाम का एक आदमी इस पूरे खेल को कर रहा है। थाने से लेकर अधिकारी त‍क सभी को मैनेज करने का दावा करने वाला मतैया ही है। नोटों की चमक और सिक्कों की खनक में कानून का राज कहीं खो गया प्रतीत होता है।

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