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पीएम नरेंद्र मोदी के प्रयास से संकरी गलियों से मुक्त हुआ काशी का मुक्ति द्वार


🗒 शनिवार, मार्च 09 2019
🖋 विक्रम सिंह यादव, प्रधान संपादक

मोक्ष की नगरी के रूप में ख्यात काशी जिसे खुद बाबा विश्वनाथ और गंगा नने यह मान-पहचान दी। श्रद्धा के भावों ने इसे 'हर हर महादेव शम्भो काशी-विश्वनाथ-गंगे' रूप में महामंत्र मानते उच्चारण किया।

पीएम नरेंद्र मोदी के प्रयास से संकरी गलियों से मुक्त हुआ काशी का मुक्ति द्वार

मुक्ति-भुक्ति की आकांक्षा से जुड़े ये तीन शब्दमंत्र सदियों से सनातनियों की जुबान व साधना-ध्यान में भले ही एकाकार रहे हों लेकिन कल सूरज की किरणों ने इसे वास्तव में एक साथ ला दिया। श्रीकाशी विश्वनाथ धाम के कॉरिडोर ने बाबा दरबार व गंगधार को एक डोर में तो बांधा ही मुक्ति के द्वार को भी संकरी गलियों के जाल से मुक्त किया।पीएम के हाथों आधारशिला रखे जाने के कुछ ही देर बाद दक्षिण भारत से आए वृद्धजनों के दल ने यहां पर एक जगह पर खड़े-खड़े बाबा दरबार के संपूर्ण शिखर के साथ ही मां गंगा की कल-कल धारा का दर्शन किया और 'काशी-विश्वनाथ-गंगे' को साकार रूप में महसूस कर लिया। तीर्थयात्रा पर निकले किसी दल के लिए यह विभोर करने वाला ही पल होगा लेकिन इसने उन बनारसियों को भी दांतों तले अंगुली दबाने को विवश किया जिन्होंने बालपन से बनारस को जिया है।बचपन से लेकर पचपन तक की उम्र संकरी गलियों में बिताई। तीज-त्योहार पर कभी पूजन-अनुष्ठान के लिए निकले तो कंधे छिल जाने वाली भीड़ से जूझने के बाद ही मां गंगा और अपने भोले बाबा से मिले। नित्य के जिल्लत भरे सिलसिले खत्म होने की उम्मीद में नेमियों के चेहरे तो वसंत ऋतु में चहकते फूलों की तरह खिले। करीब दो वर्ष से कॉरिडोर बनने की बातें सुन होंठ दबाकर मुस्कुराने वालों ने भी अखबारों में जब इसका उभरा-निखरा आकार देखा तो कौतूहलवश उनके कदम भी आभा निरखने इस ओर बढ़ चले।

बाबा के मंदिर से लेकर मणिकर्णिकाघाट के समीप तक खुला मैदान, सूरज की रोशनी में चमकता आसमान और न जाने कब से दीवारों में दफन मंदिरों के रूप में श्रद्धा-आस्था के स्थान देख मत्था टेका और निराशा के घुप अंधेरे से धूल झाड़ती उनकी उम्मीदों को एक बार फिर पंख लग गए। कॉरिडोर में ऐसे दृश्यों से सुबह से ही दो चार हो रहे समाजसेवी सुरेश तुलस्यान की जुबान से हमलावर अंदाज में गोले दगे। बेबाकी से कहा-गंगा व बाबा जीवन प्रदाता तो मुक्ति के भी दाता हैं। दोनों का ही जनम-जनम का नाता है और उन्हें अब तक अलग रखा गया। परंपरा और श्रद्धा-आस्था के नाम पर काशी को विकास की धारा से वर्षों से अलग रखा गया। 'जहां चाह, वहां राह', प्रधानमंत्री के संकल्पों ने कॉरिडोर के रूप में इसे सिद्ध और साबित किया।वास्तव में शिलान्यास के बाद पीएम ने भी शास्त्र के तहत बंधन का पालन करते हुए जमीन पर उतर रहे इस पूरे प्रोजेक्ट की केस स्टडी का बीएचयू को सुझाव देते समय भी अपने मंतव्य को स्पष्ट कर दिया। कहा यह प्रोजेक्ट दुनिया के लिए नजीर बनेगा। 

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