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अलीगढ़, 90 के दशक में गांवों में या सामान्यता हर घरों में नहीं हुआ करते थे हैंड सैनीटाइजर- विवेक शर्मा


🗒 सोमवार, जून 15 2020
🖋 आशीष कुमार शर्मा, ब्यूरो प्रमुख अलीगढ

अलीगढ़,90 के दशक में गांवों में या सामान्यता हर घरों में हैंड सैनीटाइजर नहीं हुआ करते थे, और साबुन भी दुर्लभ वस्तुओं की श्रेणी आता था तब उस समय हाथ धोने के लिए सर्वसुलभ वस्तु चूल्हे की राख थी जो गोबर के कण्डों व लकडी के जलाये जाने से बाद बनती थी। जिसका प्रयोग हम हाथ धोने, बर्तन साफ करने, सब्जियों के तने पर छिड़कने का काम करते थे।चूल्हे की राख में ऐसा क्या था कि वह उस जमाने में इसे प्रयोग करते थे। यह हाथों के लिए बहुत अच्छा हैंड सैनीटाइजर व बर्तन को साफ करने का सुरक्षति तरीका थाराख में वह सभी तत्व पाए जाते हैं जो पौधों में उपलब्ध होते हैं। यह सभी पौधे माइक्रो न्यूट्रीयन्स या तो मिट्टी से ग्रहण करते हैं या फिर वातावरण से।
इन सबमें सबसे अधिक मात्रा में कैल्शियम होता था। इसके अलावा पोटेशियम, अल्युमिनियम, मैग्नीशियम, आयरन, फॉस्फोरस, मैगनीज, सोडियम और नाइट्रोजन कुछ मात्रा में जिंक, बोरोन, कॉपर, लैड, क्रोमियम, निकल, मोलीब्डीनम, आर्सेनिक, कैडमियम, मरकरी और सेलेनियम भी होता है। इस विषय को गौ -भस्म के लेख पर भी समझाया था।राख में मौजूद कैल्शियम और पोटेशियम के कारण इसकी पीएच 9 से 13.5 तक होती है। और आपको ध्यान होगा कि अधिक PH VAILUE व अधिक मात्रा में आक्सीजन होने से कोई भी जीवाणु पनप नहीं सकते है। इसी उच्च PH के कारण जब कोई व्यक्ति इस हाथ में राख लेकर और उस पर थोड़ा पानी डालकर रगड़ता था तो बर्तन व हाथ दोनो साफ हो जाते थे। माहौल पैदा करती है साबुन में भी बहुत अधिक PH है जिसको रगड़ने पर परिणाम यह होता है कि जीवाणु और विषाणु खत्म हो जाते हैं, पर उस साबुन में मैक्रोन्यूट्रीयन्स नहीं हैपंचगव्य के साथी कैंसर व अनेक वीमार रोगियों के लिए भस्म बनाते हैं, पर अब गाँव में कोई चूल्हे पर खाना नहीं बनाता तो यह राख मिलनी मुश्किल है। पर गाँवो में दही जमाने की प्रक्रिया वही है। ठंडी के मौसम में अलाव की राख भी मिल सकती है। इन दोनों विधियों से राख इकट्ठी करके लाखो रुपये किसान कीटनाशकों पर खर्च हो रहे रसायनों के बदले बचा सकते हैं।।मृत व्यक्ति की देह की राख को पानी में मिलाने से वह पंचतत्वों में समाहित हो जाती है। मृत देह को अग्नि तत्व के हवाले करते समय उसके साथ लकड़ियाँ और उपले भी जलाये जाते हैं और अंततः जो राख पैदा होती है उसे जल में प्रवाहित किया जाता है।जल में प्रवाहित की गई राख जल के लिए डिसइंफैकटेन्ट का काम करती है। इस राख के कारण मोस्ट प्रोबेबिल नम्बर ऑफ कोलीफॉर्म (MPN) में कमी आती है और साथ ही उसमें डिजाल्व ऑक्सीजन (DO) की मात्रा में बढोत्तरी भी होती है।वैज्ञानिक अध्ययनों में यह स्पष्ट हो चुका है कि गाय के गोबर से बनी राख डिसइन्फेक्शन पर्पज के लिए लो कोस्ट एकोफ़्रेंडली विकल्प है जिसका उपयोग सीवेज वाटर ट्रीटमेंट (STP) के लिए भी किया जा सकता है।

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