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कैंट सीट पर भाजपा और सपा ने अभी तक नहीं खोले पत्ते


🗒 गुरुवार, सितंबर 12 2019
🖋 विक्रम सिंह यादव, प्रधान संपादक

कैंट विधानसभा उपचुनाव में अब भाजपा और सपा उम्मीदवारों पर ही सबकी नजरें हैं। भाजपा में तो टिकट पाने वालों की लंबी लाइन है, तो समाजवादी पार्टी भी किसी बाहरी चेहरे को उतारने की तैयारी में है। इस सीट से बसपा ने अरुण द्विवेदी को मैदान में उतारकर ब्राह्मण कार्ड खेला है। वहीं  कांग्रेस ने सिख समुदाय के दिलप्रीत सिंह को मैदान में उतारा है। कैंट विधानसभा सीट पर ब्राह्मण मतों के बाद सिख मतों की भी बड़ी संख्या है। भाजपा से टिकट पाने वाले प्रमुख दावेदारों में पूर्व विधायक सुरेश तिवारी का नाम है। वह मौजूदा समय संगठन का काम कर रहे हैं और उन्हें अवध क्षेत्र का अध्यक्ष का जिम्मा सौंपा गया है, लेकिन भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी के नाम की चर्चा से तिवारी खेमे में हलचल मची है। हालांकि भाजपा से करीब बीस लोगों ने दावेदारी की है, जिसमें कई तो कैंट विधानसभा क्षेत्र में रहते भी नहीं हैं। सपा की महानगर इकाई ने सात संभावित उम्मीदवारों की सूची हाईकमान को भेजी है। नए नाम में मेजर आशीष चतुर्वेदी का नाम उभरा है। आशीष का सपा परिवार से रिश्ते अच्छे हैं।कैंट विधानसभा सीट से विधायक रहीं डॉ. रीता बहुगुणा जोशी के प्रयागराज संसदीय सीट से चुनाव जीतने के बाद ही उपचुनाव को लेकर उम्मीदवारों ने अपनी-अपनी दावेदारी करने लगे थे। हालांकि प्रो. रीता बहुगुणा जोशी अपने पुत्र मंयक जोशी को उपचुनाव में उतारकर सीट को कब्जे में रखना चाहती थीं, लेकिन यह समीकरण चल नहीं पा रहा है। इसी तरह आरएसएस खेमे से प्रशांत भाटिया भी दावेदारी कर रहे हैं। प्रशांत के पिता सतीश भाटिया 1991 और 1993 में कैंट से विधायक थे और 1991 में पहली बार उन्होंने भाजपा का परचम लहराया था। प्रशांत की मां संयुक्ता भाटिया लखनऊ की महापौर हैं।मुलायम की बहू अपर्णा यादव भी कैंट सीट पर जोर-आजमाइश करने की तैयारी में हैं। मुलायम परिवार में बंटवारे के बाद समाजवादी पार्टी से टिकट उन्हें मिलेगा? यह भी सवाल है। वह शिवपाल खेमे में दिख चुकी हैं। हालांकि चर्चा है कि अपर्णा भाजपा से टिकट पाने की चाहत में हैं।कांग्रेस ने पिछले विधान सभा चुनाव में सपा से गठबंधन किया था और गठबंधन की यह सीट समाजवादी पार्टी के खाते में गई थी। वर्ष 2012 में कांग्रेस उम्मीदवार रीता जोशी ने कैंट सीट से मौजूदा भाजपा विधायक रहे सुरेश तिवारी को हरा दिया था। सुरेश तिवारी 1996, 2002 और 2007 में विधायक रहे थे। 1957 से लेकर 1989 तक कैंट सीट दो चुनाव को छोड़कर सात चुनाव में कांग्रेस के कब्जे में रही थी।कैंट सीट से कांग्रेस उम्मीदवार दिलप्रीत सिंह पंद्रह साल पहले ही कांग्रेस से जुड़े थे और वर्तमान समय अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य हैं। कृष्णानगर के विजय नगर और कानपुर रोड एलडीए कॉलोनी निवासी दलप्रीत सिंह का रियल एस्टेट का कारोबार है। हालांकि इस सीट से पांच बार से पार्षद गिरीश मिश्र के अलावा वीरेंद्र मदान और प्रदीप सिंह भी दावेदारी कर रहे थे, लेकिन कांग्रेस ने नया नाम देकर हर किसी को चौका दिया। 

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