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IPS किशोर कुणाल ने अपनी पुस्तक अयोध्या रिविजिटेड और अयोध्या बियांड एड्यूस्ड एविडेंस में किया दावा


🗒 गुरुवार, अगस्त 29 2019
🖋 विक्रम सिंह यादव, प्रधान संपादक

रामजन्मभूमि पर बना मंदिर 1528 में बाबर के आदेश पर उसके सेनापति मीर बाकी ने नहीं बल्कि 1660 में मुगल सम्राट औरंगजेब के हुक्म पर अवध के गवर्नर फिदाई खान ने तुड़वाया था। पूर्व आइपीएस अधिकारी, कवि एवं लेखक किशोर कुणाल ने अपनी पुस्तक 'अयोध्या रिविजिटेड' और 'अयोध्या बियांड एड्यूस्ड एविडेंस में यह दावा किया है। उनका कहना है कि बाबर धर्मांध नहीं था। ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता, जिससे यह कहा जाय कि उसने कोई मंदिर तोड़ा या तुड़वाया, जबकि औरंगजेब धर्मांध था।किशोर कुणाल कहते हैं कि इटालियन यात्री मनूची ने अपने यात्रा वृत्तांत में लिखा है कि औरंगजेब ने भारत के अगणित मंदिरों को तोड़ा और तुड़वाया था। इनमें काशी का विश्वनाथ मंदिर, मथुरा की कृष्ण जन्मभूमि, अयोध्या का राम मंदिर और हरिद्वार का एक मंदिर प्रमुख था। इस यात्रा वृत्तांत के हवाले से अपनी पुस्तक में किशोर कुणाल लिखते हैं कि औरंगजेब ने राम मंदिर को तुड़वाया था।औरंगजेब ने 1658 में गद्दी संभालते ही मंदिरों को तोडऩे का अभियान शुरू किया। वह गद्दी के दूसरे दावेदार दारा शिकोह से काफी चिढ़ा था। दारा ने उपनिषदों का अनुवाद कराया और भूमिका में स्वप्न में दो तेजस्वी पुरुषों के दिखने का जिक्र लिखा। इसमें से एक गुरु वशिष्ठ तो दूसरे भगवान राम थे। आचार्य कुणाल के मुताबिक, दारा के ऐसे विवरण से खफा औरंगजेब ने भगवान राम की उपासना के सबसे बड़े केंद्र राम जन्मभूमि पर बने राममंदिर को निशाना बनाया होगा।इतिहासकार मानते हैं कि अयोध्या का स्वर्गद्वार मंदिर और त्रेता के ठाकुर का मंदिर औरंगजेब के आदेश पर तोड़े गए। कई विद्वानों की मान्यता है कि ध्वंस के इसी अभियान में औरंगजेब की सेना ने राम मंदिर को निशाना बनाया। औरंगजेब के अयोध्या आने का प्रमाण नहीं मिलता, लेकिन उसके आदेश पर अवध सूबे के तत्कालीन गवर्नर फिदाई खान की अगुवाई में अयोध्या में मंदिर तोड़े जाने का अभियान चलने के प्रमाण हैं। वह दो बार अवध का गवर्नर बना। पहली बार वह 1658 से 62 तक अवध का गवर्नर था और इसी दौरान उसने मंदिर तोड़ा। किशोर कुणाल मंदिर-मस्जिद विवाद के मर्मज्ञ माने जाते हैं। 1991 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने अयोध्या मसला हल करने का प्रयास किया, तब वे प्रधानमंत्री के विशेष दूत के रूप में इस मसले के समाधान की ओर उन्मुख हुए। मंदिर आंदोलन के पर्याय रहे महंत रामचंद्रदास परमहंस एवं बजरंगबली की प्रधानतम पीठ हनुमानगढ़ी से जुड़े शीर्ष महंत ज्ञानदास के वे अत्यंत करीबी माने जाते हैं। वे सुप्रीमकोर्ट में विचाराधीन मंदिर-मस्जिद विवाद के पक्षकार भी हैं। गुजरात के अपर पुलिस महानिदेशक रहते स्वै'िछक सेवानिवृत्ति लेने के बाद उन्होंने समरसता और राममंदिर से जुड़े इतिहास पर केंद्रित पुस्तकें लिखीं और रामनगरी को केंद्र बनाकर आध्यात्मिक प्रकल्प भी संचालित कर रखा है। 

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