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रामनगरी अयोध्‍या के शरीफ चचा को मिला पद्मश्री


🗒 सोमवार, नवंबर 08 2021
🖋 विक्रम सिंह यादव, प्रधान संपादक
रामनगरी अयोध्‍या के शरीफ चचा को मिला पद्मश्री

अयोध्या, । लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करने के लिए प्रसिद्ध मो. शरीफ को सोमवार को दिल्ली में पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया गया। जवान बेटे की मौत और फिर लावारिस की तरह अंतिम संस्कार होना शरीफ चचा की संवेदनाओं को अंदर तक झकझोर गया। अपने इस गम के साथ वे मानवता की सेवा के ऐसे पथ पर चल पड़े, जो न सिर्फ नजीर बना बल्कि, औरों के लिए प्रेरणा भी और खुद उनके लिए ताउम्र निभाने वाली शपथ। शरीफ चचा की उपलब्धियों पर रामनगरीवासियों को भी गर्व है। करीब 27 वर्ष से शरीफ चचा संकल्प के पथ पर चल रहे हैं।वर्ष 1993 में उनके पुत्र मो. रईस दवा लेने के लिए सुलतानपुर गए थे, जहां एक दुर्घटना में उनकी मौत हो गई। बेटे की खोज में मो. शरीफ कई दिनों तक इधर-उधर भटकते रहे, लेकिन चचा को बेटे का कोई सुराग नहीं मिला। करीब एक माह बाद सुलतानपुर से खबर आई कि बेटे की मौत हो गई और लावारिस की तरह अंतिम संस्कार भी कर दिया गया। रईस की पहचान उनकी शर्ट पर लगे टेलर के टैग से हुई थी। टैग से पुलिस ने टेलर की खोज की और कपड़े से शरीफ चचा ने मृतक की पहचान अपने बेटे के रूप में की। इसी के बाद शरीफ चचा ने यह संकल्प लिया कि अब अयोध्या की धरती पर किसी भी शव का अंतिम संस्कार लावारिस की तरह नहीं होगा। फिर चाहे वह किसी भी धर्म का हो।शरीफ चचा ने शपथ ली कि वे हर लावारिस शव का अंतिम संस्कार करेंगे और मृतक के धर्म के रीति-रिवाज के अनुसार। कृशकाय हो चुके शरीफ चचा ने 27 वर्षों में करीब 25 हजार लावारिस शवों का अंतिम संस्कार किया है। करीब 80 वर्ष की उम्र में भी हौसले और जुनून से वे अपने संकल्प पथ पर चलते रहे। मोहल्ला खिड़की अली बेग निवासी मो. शरीफ पेशे से साइकिल मिस्त्री हैं। उनके चार बेटों में दो की मौत हो चुकी है, जिसमें एक मो. रईस भी थे, जिसका अंतिम संस्कार सुलतानपुर जिले में लावारिस के रूप में हुआ था। उनके बेटे अशरफ और मो. सगीर हैं।