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सावन के सुहाने मौसम में विश्वजाल पर वर्षा ऋतु की कविताओं का हिमांशु त्रिपाठी (प्रियम) द्वारा लिखित नया संग्रह


🗒 शनिवार, अगस्त 10 2019
🖋 विक्रम सिंह यादव, प्रधान संपादक
हिमांशु त्रिपाठी (प्रियम) की तीन वर्षा रचनाएं
 
विपत्ति-ग्रस्त
बारिश
थमने का नाम नहीं लेती, 
जल में डूबे 
गाँवों-कस्बों को 
थोड़ा भी आराम नहीं देती! 
सचमुच, 
इस बरस तो क़हर ही 
टूट पड़ा है, 
देवा, भौचक खामोश 
खड़ा है! 
ढह गया घरौंदा
छप्पर-टप्पर, 
बस, असबाब पड़ा है 
औंधा! 
आटा-दाल गया सब बह, 
देवा, भूखा रह! 
इंधन गीला 
नहीं जलेगा चूल्हा, 
तैर रहा है चौका 
रहा-सहा! 
घन-घन करते 
नभ में 
वायुयान मँडराते गिद्धों जैसे! 
शायद, 
नेता/ मंत्री आए 
करने चहलक़दमी, 
उत्तर-दक्षिण पूरब-पश्चिम 
छायी ग़मी-ग़मी! 
अफ़सोस
कि
बारिश नहीं थमी!
अन्तर
बचपन में 
हर बारिश में 
कूद-कूद कर कैसा अलमस्त 
नहाया हूँ!
चिल्ला-चिल्ला कर 
कितने-कितने गीतों के 
मुखड़े गाया हूँ!
जीवित
है वह सब 
स्मरण-शक्ति में मेरी! 
ज्यों-ज्यों बढ़ती उम्र गई 
बारिश से घटता गया लगाव, 
न वैसा उत्साह रहा न वैसा चाव, 
तटस्थ रहा, निर्लिप्त रहा! 
अति वर्षा से 
कुछ चिन्तित आशंकित — 
ढह जाए न 
टपकता घर मेरा, 
दूर बसा मज़दूरों का डेरा, 
बह जाए न कहीं 
निर्धन
मानवता का जीर्ण बसेरा!
मेघ-गीत
उमड़ते-गरजते चले आ रहे घन 
घिरा व्योम सारा कि बहता प्रभंजन,
अंधेरी उभरती अवनि पर निशा-सी 
घटाएँ सुहानी उड़ी दे निमंत्रण!
कि बरसो जलद रे जलन पर निरन्तर
तपी और झुलसी विजन भूमि दिन भर,
करो शांत प्रत्येक कण आज शीतल 
हरी हो, भरी हो प्रकृति नव्य सुन्दर!
झड़ी पर, झड़ी पर, झड़ी पर, झड़ी हो 
जगत-मंच पर सौम्य शोभा खड़ी हो,
गगन से झरो मेघ ओ! आज रिमझिम, 
बरस लो सतत, मोतियों-सी लड़ी हो!
हवा के झकोरे उड़ा गंध-पानी 
मिटा दी सभी उष्णता की निशानी,
नहाती दिवारें नयी औ' पुरानी 
डगर में कहीं स्रोत चंचल रवानी!
कृषक ने पसीने बहाये नहीं थे, 
नवल बीज भू पर उगाये नहीं थे,
सृजन-पंथ पर हल न आए अभी थे 
खिले औ' पके फल न खाए कहीं थे!
दृगों को उठा कर, गगन में अड़ा कर 
प्रतीक्षा तुम्हारी सतत लौ लगा कर—
हृदय से, श्रवण से, नयन से व तन से, 
घिरो घन, उड़ो घन घुमड़कर जगत पर!
अजब हो छटा बिजलियाँ चमचमाएँ
अँधेरा सघन, लुप्त हों सब दिशाएँ
भरन पर, भरन पर सुना राग नूतन 
नया प्रेम का मुक्‍त-संदेश छाये!
विजन शुष्क आँचल हरा हो, हरा हो, 
जवानी भरी हो सुहागिन धरा हो,
चपलता बिछलती, सरलता शरमती, 
नयन स्नेहमय ज्योति, जीवन भरा हो!
हिमांशु त्रिपाठी (प्रियम)
  हरदोई- उत्तर प्रदेश

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