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जिला हाथरस में विरोध दबाने को भाजपा ने चुना निर्विवाद चेहरा


🗒 बुधवार, मार्च 27 2019
🖋 विक्रम सिंह यादव, प्रधान संपादक

भाजपा प्रत्याशी को लेकर चर्चाओं में रही हाथरस सीट पर राजवीर दिलेर को टिकट देकर भाजपा ने सभी को चौंका दिया। मोबाइल और टीवी पर टकटकी लगाए बैठे लोगों को रात एक बजे जब राजवीर दिलेर की टिकट फाइनल होने की जानकारी मिली तो उन्हें यकीन ही नहीं हुआ। कुछ देर बाद भाजपा के प्रत्याशियों की सूची जारी होने पर सभी इस नाम की घोषणा के पीछे की वजह तलाशने में जुट गए। ऐसे में सांसद राजेश दिवाकर के विरोध को दबाने के लिए निर्विवाद चेहरा लाने की बात सामने आई है। वहीं इसे लोग उनके पिता किशनलाल दिलेर की पार्टी के प्रति निष्ठा से जोड़कर भी देख रहे हैं।

जिला हाथरस में विरोध दबाने को भाजपा ने चुना निर्विवाद चेहरा

होली वाले दिन की शाम को जारी हुई भाजपा की पहली सूची में हाथरस के प्रत्याशी का नाम शामिल न होने पर कयासों का दौर शुरू हुआ। टिकट के लिए करीब दो दर्जन दावेदारों में से सांसद राजेश दिवाकर, उनकी पत्नी श्वेता चौधरी, पूर्व कैबिनेट मंत्री अशोक प्रधान, प्रदेश मंत्री अंजुला माहौर, केंद्रीय सफाई कर्मचारी आयोग की सदस्य मंजू दिलेर, आगरा के सांसद डॉ. रामशंकर कठेरिया आदि के नाम चर्चाओं में थे। छह दिन से पार्टी हाथरस सीट पर मंथन में जुटी थी। इस बीच खबरें आ रही थीं कि मौजूदा सांसद राजेश दिवाकर के नाम का तीन विधायकों समेत अन्य लोगों ने विरोध किया है। वहीं संघ के कुछ  पदाधिकारी राजेश दिवाकर के साथ होने के दावे किए जा रहे थे। हर दिन हाथरस की टिकट को लेकर सभी अपने-अपने दावे कर रहे थे।सोशल मीडिया पर हर घंटे किसी न किसी नाम की चर्चाएं हो रही थीं, लेकिन राजवीर दिलेर का नाम बिल्कुल भी चर्चाओ में नहीं था। यह बात जरूर थी कि वह अपनी बेटी मंजू दिलेर को टिकट दिलाने के लिए प्रयासरत थे। इन सब कयासों के बीच देर रात एक बजे जब खुद राजवीर दिलेर के नाम की घोषणा हुई तो सभी चौंक गए। नामांकन के आखिरी दिन मंगलवार को भाजपा का विजय संकल्प सम्मेलन भी था। इसमें प्रत्याशी के नाम की चर्चाएं होती रहीं। इस नाम के पीछे की सबसे बड़ी वजह दिलेर की साफ सुधरी छवि और निर्विवाद होना बताया जा रहा है। वहीं उनके पिता किशन लाल दिलेर के समर्पण का इनाम भी बताया जा रहा है।

राजवीर दिलेर के पिता अपनी सादगी और गिलास साथ चलने को लेकर चर्चाओं रहते थे। राजवीर भी पिता की तरह चर्चाओं में रहे। वह भी चुनाव के दौरान पिता की तरह जेब में गिलास लेकर चले। जब कहीं पानी पीना होता था तो वह खुद अपनी गिलास निकालते और उसमें पानी लेकर पीते थे। उनकी यही सादगी पार्टी को भायी और उन्हें प्रत्याशी घोषित कर दिया।इगलास विधानसभा सीट 2012 में नए परिसीमन के तहत अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित कर दी गई। 2012 में यहां से रालोद के त्रिलोकीराम दिवाकर ने जीत दर्ज की थी जो इस लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी हैं। इधर 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने राजवीर दिलेर को मैदान में उतारा। उन्होंने 75 हजार वोटों से जीत दर्ज कर रिकॉर्ड बना दिया। यह जीत इस लिए भी बड़ी थी कि नए परिसीमन में इगलास से भाजपा का उम्मीदवार जीता था। इसी का इनाम भाजपा ने राजवीर को दिया है।राजवीर दिलेर सांसद प्रत्याशी की दौड़ में शामिल नहीं थे। वह अपनी बेटी मंजू दिलेर को टिकट दिलाने का प्रयास कर रहे थे। सोमवार देर रात जब उनके पास फोन पहुंचने लगे कि उनकी टिकट फाइनल हो गई है तो उन्हें यकीन ही नहीं हुआ। उसके काफी देर बाद उन्होंने इसकी पुष्टि की। इसके बाद वह रातभर नामांकन की तैयारी में जुटे रहे।राजवीर दिलेर अगर चुनाव जीतते हैं तो उन्हें इगलास विधानसभा क्षेत्र से अपनी सदस्यता छोडऩी पड़ेगी। ऐसे में इगलास में उपचुनाव के लिए भी कई लोग दावेदारी की तैयारी में जुट गए हैं।

विधायक रहते हुए राजवीर दिलेर को भाजपा के सांसद की टिकट देने के पीछे उनके पिता की कर्मठता और निष्ठा बड़ी वजह मानी जा रही है। अपनी सादगी के कारण ही किशनलाल दिलेर चार बार सांसद बने। इससे पहले वह छह बार विधायक का चुनाव लड़े और तीन बार जीत दर्ज की। अब यह बागडोर राजवीर दिलेर के कंधों पर है।राजवीर दिलेर के पिता किशन लाल दिलेर हाथरस लोकसभा सुरक्षित सीट से चार बार सांसद रह चुके हैं। वह लगातार 1996, 1998, 1999 और 2004 में संसद पहुंचे थे। 2004 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस की लहर में भी जीत दर्ज की थी। 1996 में उन्होंने बसपा के रनवीर ङ्क्षसह कश्यप को हराया था। 1998 में बसपा के ही गंगा प्रसाद पुष्कर, 1999 में फिर से गंगा प्रसाद पुष्कर और 2004 में रामवीर भैयाजी को शिकस्त दी थी। वर्ष 1996 से पहले किशन लाल दिलेर ने अलीगढ़ की कोल विधानसभा सीट से छह बार विधानसभा चुनाव लड़े थे, जिनमें वह तीन बार जीते थे। 1974 में वह जन संघ से मैदान में उतरे थे और कांग्रेस के पूरन चंद ने उन्हें हरा दिया था। इस चुनाव में पूरन चंद को 23 हजार वोट मिले थे, जबकि किशन लाल दिलेर 13 हजार वोट हासिल कर सके थे।वह इमरजेंसी के बाद कोल से जनता पार्टी से मैदान में उतरे। उन्होंने 33 हजार से अधिक वोट हासिल किए और पूरनचंद को 14 हजार वोटों से हराया था। 1980 के चुनाव में कोल विधानसभा से ही उन्हें फिर पूरन चंद ने 3300 वोटों से हरा दिया था। 1985 में वह कोल विधानसभा में भाजपा से प्रत्याशी बनाए गए। उन्होंने 23 हजार वोट पाकर 1288 वोटों के अंतर से कांग्रेस के चंद्रपाल सैलानी को हरा दिया था। इसके बाद 1989 के चुनाव में किशनलाल दिलेर कांग्रेस के राम प्रसाद देशमुख से महज एक हजार वोटों से हार गए थे। उन्होंने अपना आखिरी विधानसभा चुनाव भाजपा के ङ्क्षसबल पर कोल विधानसभा से 1991 में लड़ा। इसमें 30 हजार वोटों से रिकॉर्ड जीत दर्ज की थी। उन्हें 52 हजार वोट मिले थे जबकि जनता दल के फूल ङ्क्षसह को 22 हजार वोट मिले थे। इसके बाद वह लगातार चार बार सांसद बने।राजवीर दिलेर की पत्नी रजनी दिलेर को 2012 के विधान सभा चुनाव में हाथरस सुरक्षित सीट पर टिकट मिल गई थी। नामांकन से एक दिन पहले उनकी टिकट पार्टी ने काट दी और राजेश दिवाकर को प्रत्याशी घोषित कर दिया। इसमें राजेश दिवाकर छह हजार वोटों से हार गए थे। 52 हजार वोट पाकर बसपा के गेंदालाल चौधरी चुनाव जीते थे। अब पार्टी ने राजेश दिवाकर का टिकट काट राजवीर दिलेर को सौंपकर हिसाब बराबर कर दिया है।

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