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खाते में तीन करोड़, लाभ किसी को नहीं


🗒 गुरुवार, अप्रैल 17 2014
🖋 Rahul Balmiki, Reporter Kanpur

ललितपुर। डायबिटीज, हार्टअटैक व कैंसर रोगियों के मुफ्त इलाज के लिए जिले में संचालित एनसीडी (नॉन कम्युनिकेबिल डिसीज) सेल मरीजों के लिए छलावा साबित हो रहा है। दो वित्तीय वर्ष बीतने के बाद तीन करोड़ 44 लाख रुपये स्वास्थ्य विभाग के खातों में पड़े रहे, लेकिन असाध्य रोग से ग्रसित एक भी मरीज को इलाज की सुविधा नसीब नहीं हुई। विभागीय अफसर इसकी वजह शासन से गाइड लाइन न आना बता रहे हैं। 
वित्तीय वर्ष 2012-13 में जनपद मुख्यालय स्थित जिला चिकित्सालय सहित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र स्तर पर एनसीडी सेल की स्थापना की गई थी। डायबिटीज, हार्टअटैक व कैंसर रोगियों के निशुल्क इलाज के लिए दो करोड़ 23 लाख रुपये का बजट आवंटित किया गया था। योजना के मुताबिक कैंसर रोगियों को हर वर्ष एक लाख रुपये की दवाइयां उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया। इसके बाद सेल से संबंधित विशेषज्ञों को दरकिनार रखते हुए अन्य स्टाफ की नियुक्तियां कर ली गईं। जिला चिकित्सालय (पुरुष) में सेल के संचालन के लिए अस्पताल में तैनात चिकित्सकों से वैकल्पिक सेवाएं ली जाने लगीं, लेकिन नतीजा सिफर रहा। वित्तीय वर्ष 2012 - 13 बीतने बाद एक भी कैंसर रोगी को इस सेल में इलाज नसीब नहीं हुआ।
इस संबंध में केंद्रीय ग्रामीण विकास राज्यमंत्री प्रदीप जैन आदित्य ने जिलाधिकारी एवं मुख्य चिकित्सा अधिकारी को सेल में विशेषज्ञों की तैनाती के निर्देश दिए थे, लेकिन अब तक कार्रवाई आगे नहीं बढ़ सकी है। वित्तीय वर्ष 2013- 14 में एनसीडी सेल के लिए एक करोड़ 21 लाख की धनराशि आवंटित की गई। इस तरह तीन करोड़ 44 लाख से अधिक की धनराशि विभाग के खाते में है। इसमें से एनसीडी सेल में नियुक्त स्टाफ के वेतन के लिए 10 लाख 35 हजार प्रतिमाह खर्च के अलावा जिला अस्पताल में एनसीडी क्लीनिक खोलने के लिए 15 लाख रुपये खर्च किए जा चुके हैं। 
इस संबंध में विभागीय अफसर विशेषज्ञों की सलाह के बगैर दवाइयां उपलब्ध नहीं करा पाने तथा गाइडलाइन न आने की बात कह रहे हैं। वहीं, मरीज और उनके परिजन इलाज की खातिर भटकने को मजबूर हैं। 
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जनपद में सत्तर लोग कैंसर से पीड़ित
गंभीर बीमारियों से ग्रसित मरीजों के हितार्थ काम कर रही एचबीएम संस्था के पेलेटिव केयर डिपार्टमेंट के आंकड़ों के अनुसार जनपद में सत्तर मरीज कैंसर से ग्रसित हैं। शहरी क्षेत्र में इनकी संख्या अट्ठारह है, वहीं अन्य ग्रामीण क्षेत्रों के हैं। इनमें कई मरीजों की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर है, वे कैंसर की जांच व इलाज कराने में भी सक्षम नहीं हैं। 
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इन्हें नहीं मिली मदद
कोतवाली क्षेत्रांतर्गत निवासी मूलाबाई (45) स्तन कैंसर से ग्रसित हैं। निजी अस्पताल में उपचार के दौरान उन्हें बीमारी की जानकारी हुई। मई 2010 में उन्होंने ग्वालियर के कैंसर अस्पताल में सर्जरी कराई, जिसमें सारी जमापूंजी खत्म हो गई। इनके परिवार की आजीविका मजदूरी पर ही निर्भर है। सेल में सहायता की गुहार लगाने के बाद भी उन्हें कोई मदद नहीं मिल सकी। 
भानकुंवर (35) को वर्ष 2010 में भोपाल में जांच कराने पर स्तन कैंसर का पता चला। भानकुंवर के परिवार की आजीविका का मुख्य साधन खेती है। सरकारी स्तर पर उन्हें कोई सहायता नहीं मिली है। एचबीएम की पेलेटिव संस्था ने इनके उपचार व देखभाल का जिम्मा लिया है।

 

 

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