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परीक्षा के व‍िरोध पर हाई कोर्ट ने कहा, विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने अपनी बात रखें छात्र


🗒 शुक्रवार, जून 26 2020
🖋 विक्रम सिंह यादव, प्रधान संपादक

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने 19 जून के नोटिस व 23 जून को जारी परीक्षा स्कीम को निरस्त किये जाने के साथ मास प्रमोशन की मांग कर रहे छात्रों को एक प्रत्यावेदन के जरिए अपनी बात लखनऊ विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने रखने को कहा है। न्यायालय पहुंचे छात्रों से कहा गया कि इस मामले पर विश्वविद्यालय प्रशासन निर्णय लेगा। जस्टिस सौरभ लवानिया की एकल पीठ ने यह आदेश जतिन कटियार व 22 अन्य छात्र-छात्राओं की ओर से दाखिल की गई याचिका खारिज करते हुए पारित किया।याचिका का विरोध करते हुए लखनऊ विश्वविद्यालय के अधिवक्ता सवित्र वर्धन सिंह का तर्क था कि याचिका पोषणीय नहीं है। इसके साथ वकालतनामे में केवल एक छात्र के हस्ताक्षर हैं, जबकि याची 23 हैं। साथ ही यह भी कहा गया कि याचिका में उचित पक्षकार नहीं बनाए गए हैं और न ही उन शासनादेशों को चुनौती दी गई है, जिनको आधार बनाकर विश्वविद्यालय ने स्कीम जारी की है। सारे तथ्यों पर गौर करने के बाद कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। हांलाकि बाद में याचियों को अपनी बात विश्वविद्यालय के सामने रखने के लिए प्रत्यावेदन देने की छूट दे दी। इस याचिका का मुख्य आधार कोरोना महामारी को बनाया गया था।कहा गया कि विश्वविद्यालय के परीक्षा नियंत्रक ने बिना महामारी की समस्या पर गौर किये व बिना यह देखे कि ट्रेनों का पूरी तरह संचालन नहीं होने के कारण तमाम छात्र परीक्षा में आने में असमर्थ होंगे, उक्त परीक्षा कार्यक्रम घोषित कर दिया। जो छात्र पीजी में रह रहे थे, उन्हेंं नई या पुरानी पीजी तालाशने में दिक्कत होगी व यूनिवॢसटी और कॉलेजों के छात्रावासों में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन असम्भव है। याचिका में यह भी कहा गया था कि विश्वविद्यालय के तीन प्रोफेसर व कुछ स्टाफ कोरोना पॉजिटिव पाए जा चुके हैं, ऐसे में भारी मात्रा में कोरोना फैलने का भी खतरा है।याचिका में लॉकडाउन के समय चलाए गए ऑनलाइन क्लासेज पर भी सवाल उठाया गया है। छात्रों ने बीबीएयू लखनऊ, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग साइंस एंड टेक्नोलॉजी शिवपुर, आइआइटी कानपुर और दिल्ली यूनिवॢसटी का उदाहरण देते हुए मांग की कि इन विश्वविद्यालयों की तरह एलयू में भी छात्रों को मास प्रमोशन दिये जाने के विकल्प या ऑनलाइन परीक्षा इंटरनेट और लैपटॉप की उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए कराए जाने पर विचार किया जाए। याचिका पर सुनवाई के बाद कोर्ट ने छात्रों को अपनी बात विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने रखने को कहा है।  

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