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राज्यसभा चुनाव को लेकर दिखने लगा समाजवादी पार्टी से गठबंधन तोड़ने का साइड इफेक्ट


🗒 गुरुवार, अक्टूबर 29 2020
🖋 विक्रम सिंह यादव, प्रधान संपादक
राज्यसभा चुनाव को लेकर दिखने लगा समाजवादी पार्टी से गठबंधन तोड़ने का साइड इफेक्ट

लखनऊ , उत्तर प्रदेश में राज्यसभा चुनाव को लेकर बुधवार को राजधानी में हुए 'पॉलिटिकल ड्रामा' के बाद बसपा प्रत्याशी का नामांकन रद होने से तो बच गया, लेकिन इस घटनाक्रम ने 'नीले पर्दे' के पीछे लगातार कमजोर होती जा रही बसपा को बेपर्दा जरूर कर दिया। 2014 में मोदी की सुनामी में शून्य पर सिमटी बसपा ने 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा से गठबंधन के सहारे दस सीटें जरूर हासिल की थी, लेकिन महज पांच माह बाद ही मायावती ने यह गठबंधन ढेर कर दिया। शायद यही वजह है कि अब बसपा के अपने नेता भी सुरक्षित सियासी ठिकाना चाहते हैं जिससे बसपा में बिखराव तेज होता दिखने लगा है।36 वर्ष पहले सूबे की राजनीति में धीरे से कदम रखने वाली बहुजन समाज पार्टी ने लगभग एक दशक पहले बहुमत की सत्ता हासिल की थी। वर्ष 2012 में सत्ता गंवाने के बाद वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली थी। जिस 'दलित-ब्राह्मण' सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले के दम पर 2007 में मायावती ने 206 विधानसभा सीटें जीतकर चौथी बार मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल की थी, उसके फेल होने के बाद बसपा का 'दलित-मुस्लिम' गठजोड़ भी कोई गुल नहीं खिला सका।2017 के विधानसभा चुनाव तक दलित-मुस्लिम वोटबैंक भी दरकने लगा और विधानसभा की सिर्फ 19 सीटें जीतने वाली बसपा तीसरे नंबर की पार्टी बनकर रह गई। इस बीच दूसरे राज्यों में भी पार्टी का प्रदर्शन बेहतर न रहने से उसके राष्ट्रीय पार्टी के दर्जे पर भी खतरा मंडराने लगा।पार्टी की घटती ताकत की वजह से एक के बाद एक जनाधार वाले नेताओं नसीमुद्दीन सिद्दीकी, स्वामी प्रसाद मौर्य, ब्रजेश पाठक, आरके चौधरी, ठाकुर जयवीर सिंह, जुगल किशोर व इंद्रजीत सरोज आदि की बगावत से भी माहौल बिगड़ता ही रहा। इसी हताशा ने मायावती को 2019 में सपा से हाथ मिलाने के लिए मजबूर किया था। सपा से गठबंधन का एलान करते हुए मायावती ने स्पष्ट तौर पर कहा था कि विधानसभा चुनाव में भी उनका गठबंधन रहेगा। इस गठबंधन ने बसपा को दस सीटें तो दिलाईं लेकिन महज साढ़े पांच माह बाद ही मायावती ने गठबंधन तोड़ने का एलान कर सपा सहित भाजपा विरोधी उन नेताओं को भी बड़ा झटका दिया, जिन्हें गठबंधन के सहारे आगामी विधानसभा चुनाव जीतने की बड़ी उम्मीदें थीं।गौरतलब है कि वर्ष 1993 में कांशीराम और मुलायम सिंह यादव ने जो गठबंधन किया था, वह करीब डेढ़ वर्ष चला था और गेस्ट हाउस कांड के कारण जून 1995 में टूटा था। इस बार गठबंधन टूटने से यह माना जाने लगा था कि बसपा का यह कदम उसके लिए कहीं ज्यादा भारी पड़ने वाला है। दबी जुबान से बसपा के ही कई नेता स्वीकारते हैं कि भाजपा से मुकाबले के लिए गठबंधन बनाए रखना जरूरी था। ऐसे नेताओं का कहना है कि अचानक गठबंधन तोड़ने के पीछे मायावती की कोई मजबूरी रही होगी, लेकिन अब उनके सामने बसपा में बने रहने की कोई मजबूरी नहीं है।पार्टी का जो हाल होता जा रहा है, उसमें जीतने की उम्मीद भी नहीं दिख रही है। ऐसे में माना जा रहा है कि राज्यसभा चुनाव के बहाने ही सही, अभी बसपा के कुछ विधायक बगावत करते दिख रहे हैं, लेकिन जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव करीब आते जाएंगे, बसपा के और विधायक, पदाधिकारी व वरिष्ठ नेता भी मायावती को झटका देते हुए उनका साथ छोडऩे में पीछे नहीं रहेंगे।

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