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भारत मे गिरता पत्रकारिता का मुल्य और पत्रकारों का कम होता आदर


🗒 शुक्रवार, सितंबर 20 2019
🖋 विक्रम सिंह यादव, प्रधान संपादक

आजादी के बाद जब संविधान सभा बनायी गयी और संविधान विशेषज्ञों की टीम ने भारतीय लोकतंत्र की स्थापना करने के लिए विश्व के सबसे बेहतरीन और सर्वोच्च संविधान भारत को सौपा था तभी संविधान सभा ने भारतीय लोकतंत्र मे भयंकर भूल कर करते हुए पत्रकारिता को अस्तित्वहीन बना डाला पत्रकारिता को चौथा स्तम्भ केवल मौखिक परिभाषित किया और पत्रकारों को बेवकूफ बनाते हुआ कहा सत्य पत्रकारिता स्वतंत्र होगी पत्रकार को संविधान मे कुछ धारा मे यह अधिकार दिया कि पत्रकार जो देखेगा जो महसूस करेगा उसे लिखने को स्वतंत्र होगा उसे राष्ट्रीय सुरक्षा के अतिरिक्त किसी भी सत्य लेखन पर कभी चुनौती नही दी जा सकती ना ही किसी ब्यक्ति द्वारा या किसी संगठन अथवा संस्थान द्वारा। लेकिन दुसरी तरह सभी तत्कालीन केन्द्रीय व प्रान्तीय सरकारों ने बार बार संविधान मे शंसोधन कर पत्रकारों को निरुद्ध करना शुरु कर दिया सबसे बडा घातक हथियार कार्यपालिका को दिया कि अगर कोई पत्रकार किसी सरकारी विभाग ,अधिकारी या कर्मचारी से सत्य पूछने या जानने की कोशिश करे तो सम्बंधित विभाग या अधिकारी कर्मचारी सरकारी काम मे बाँधा डालने पर धारा 353 के तहत मुकदमा पंजीकृत करा सकता है जिसके तहत उक्त सत्य पत्रकार को सात साल की कैद व जुर्माना देना होगा और इसी सरकारी हथियार से घायल होकर असंख्य पत्रकार जेलों मे बंद हैं इस तरह पत्रकारिता को स्वतंत्रता देकर उसके सभी अधिकार छीन लिये गये संविधान सभा ने यह भी कहा था कि पत्रकार निःशुल्क कार्य करेंगे उसके बदले उन्हे सभी सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों मे प्रथम वरीयता देते हुए दवा,शिक्षा,बुनियादी जरूरतें,और यात्राओं के दौरान शत प्रतिशत मुफ्त यानी निःशुल्क दिया जाये। बसों, ट्रेनों यहाँ तक हवाई सफर मे या तो मुफ्त अथवा आंशिक राशि ही लिया जाये लेकिन यहा भी पत्रकारों को धोखा दिया गया और धीरे धीरे उनके इस अधिकार को भी छीन लिया गया आज अगर उसके पैसे नही तो वह रोग से असमय मृत्यु को पाता अभावों मे परिवार का कुनबा भूखों मरता है पैसो के अभाव मे पत्रकारों के बच्चे उच्च शिक्षा से वंचित हो जाते है किराया नही है बस ट्रेन और हवाई सफर नही कर सकते उन्हे कोई पेंशन भत्ता सरकार द्वारा देय नही है मतलब लोकतंत्र आजादी के बाद से से ही चार पैर के बजाय तीन पैरों पर लंगडा खडा है और आज भारत मे 73 सालों से लगडी ,लूली ,अपाहिज और समस्त संवैधानिक सुविधाओं से विहीन पत्रकारिता अपने दुर्भाग्य पर अंतहीन आंसु बहा रही है।
दुसरी तरफ क्रमशः प्रति दशकों मे पत्रकार और उसकी पत्रकारिता आदर खोती रही है और यह क्रम अब भी चल रहा है इस दर्दभरी ब्यथा के लिए सरकारें, समाचार संस्थान और पत्रकार तीनो समान रुप से दोषी हैं कारण सरकार कोई सरकारी सुविधा नही देगी समाचार संस्थान मुफ्त मे पत्रकारिता करवायेंगे और पत्रकार कभी संगठित होकर एकता नही दिखायेगा और यह तीनो शुल त्रिशूल बनकर पत्रकारिता की आत्मा को लहुलुहान करते रहेंगे। अब बात आती है पत्रकार और पत्रकारिता की गिरती गरिमा और सम्मान की,तो बताना उचित होगा कि जब सरकार को सत्य जन सूचनाएं चाहिए तो उसे संविधान सभा द्वारा दिये गये मौखिक निर्देशो का पालन भी अपने मशीनरी द्वारा कराया जाना चाहिए संविधान सभा ने कहा था कि जब पत्रकार समाचार माध्यमों या समाचार पत्रों मे सत्य समाचार प्रकाशित कर तो फौरन उसका संज्ञान मजिस्ट्रेट स्तर पर जनपदो का जनपद मजिस्ट्रेट, और परगना या तहसीलों पर उप जनपद मजिस्ट्रेट समाचारों का अवलोकन करे और फौरन कारवाई करे लेकिन आज यह भी नही होता जिलों पर जिलाधिकारी के अधिकार क्षेत्र मे काम करने वाला जिला सुचना विभाग समाचारपत्र का कटिंग तो करता है लेकिन उसे प्रतिदिन मजिस्ट्रेट के सामने अवलोकन हेतू प्रस्तुत नही करता अथवा मजिस्ट्रेट इस कार्य के लिए दिशानिर्देश ही नही देता समाचारों को काट कर फाईलें बनाकर आलमारियों मे फेंक दिया जाता है कोई भी कारवाई नही होती इस तरह सत्य समाचार संकलन जैसा जोखिम भरा कार्य पत्रकारिता करने वाला ठगा का ठगा रह जाता है जिसका सीधा असर पत्रकार की पत्रकारिता और उसके सम्मान को प्रभावित कर अस्तित्व हीन बना देता है जन साधारण देखता है पत्रकार समाचार लिखने आया कुछ होगा कुछ सुधार होगा लेकिन जब जिला मजिस्ट्रेट के कार्यालय मे जाकर समाचार धूल फाँकने के लिए आलमारियों मे फेंक दिया जाता है और जन साधारण को कुछ भी लाभ नही मिलता तो वह पत्रकार को झुठा,मक्कार, दलाल जैसे अमर्यादित शब्दावली के साथ घोर अनादर का पात्र बना देता है अधिकारी, विभाग या माफिया ,अपराधी सभी बखूबी समझते है पत्रकार के लिखने से कुछ नही होता और इस तर्ह पत्रकार और पत्रकारिता दोनो अनादर और असम्मान के गहरे गर्त मे तेजी से गिर रहे हैं जिसका सीधा प्रतिकूल असर कानून और ब्यवस्था पर पड रहा है अपराध या भ्रष्टाचार कम होने के बजाय तेजी से बढ रहे हैं कारण सत्य सुचना कर्ता पत्रकार असुरक्षित और सुविधाओं ही हीन होने के साथ जन सामान्य मे बेहद कमजोर है किसी भी सफल लोकतंत्र के लिये सत्य सुचनाओं का बहुत ही महत्व है लेकिन दुर्भाग्यवश भारत मे न्याय और सबके हित मे काम करने वाला पत्रकार और उसकी पत्रकारिता दोनो लहुलुहान होकर आह से तडप रही है वर्तमान परिदृश्य मे भी दूर दूर तक सरकार द्वारा इसमे सुधार के संकेत लगभग शुन्य दिख रहे है इस तरह आज आजाद भारत का लोकतंत्र चार स्तम्भों पर खडा होने बजाय लगडी लूली अपाहिज अवस्था मे इसलिए खडी है कि चौथा स्तम्भ सुरक्षा सुविधा और संवैधानिक अधिकारों से विहीन है।

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