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महोबा - मजदूरो के लिए कोरोना बना अभिशाप


🗒 शनिवार, मई 16 2020
🖋 रजत तिवारी, बुंदेलखंड सह संपादक बुंदेलखंड

विभिन्न प्रदेशो से भारी मात्रा में पलायन करने को मजबूर है श्रमिक

महोबा - मजदूरो के लिए कोरोना बना अभिशाप

- चेहरे में किसी भी हाल में अपने घरो में पहुचने की दिख रही आस

- जनपद के यूपी-एमपी बार्डर से श्रमिको को बसो से भेजा जा रहा गन्तव्य स्थान तक

महोबा। कोरोना की आपदा का कहर इस कदर बरसा कि अर्थव्यवस्था में भी भूचाल आ गया। एक ओर कोरोना से लड़ाई तो दूसरी ओर जीवन यापन की मुशक्कत। प्रशासन ने लाॅकडाउन का सहारा लेकर आवागमन तथा दुकाने बन्द करवा दी परन्तु विभिन्न प्रदेशो में रहने वाले मजदूरो के उपर तो मुसीबत का पहाड़ ही टूट पड़ा। जैसे तैसे प्रतिदिन कमाकर खाने वालो को जीवन चलाने के लाले पड़ गये। न तो रोजगार और न तो उचित खाना-पानी की व्यवस्था। सारी मुशक्कत के बाद हार मानकर आखिरकार अपनी अंतिम उम्मीद अपने गांव की ओर निकल पड़े। न तो किसी साधन की परवाह न किसी का सहारा लिए पैदल, साइकिल के बलबूते ही अपनी गन्तव्य स्थानो के लिए पलायन करने लगे। महोबा के यूपी एमपी बार्डर विभिन्न स्थानो से पैदल चलकर आये मजदूरो की दास्तान सुनकर दिल दहल गया। एक ग्रप का कहना था कि साहब हम पंजाब से पैदल ही आ रहे है न तो हमारे पास खाने के लिए उचित भोजन है न तो रूपये, पर करे तो क्या करें रोजगार न होने से तो अच्छा है कि अपने गांव जाकर किसी प्रकार खेती करके काम चला ले। वहीं ग्रुप में मौजूद बच्चो की स्थिति भी भयावह थी जिन नन्हो की आंखो में चमक होने चाहिए उनकी आंखो में घर पहुचने की आस नजर आ रही थी। लम्बी दूरी से लगातार पैदल चलकर न जाने कितनो की चप्पले घिस गई तो न जाने कितने पैरो में छाले पड़ गये। परन्तु क्या किया जाये आखिर अपने घर की आस के आगे ये सारे जख्म भी फीकें नजर आते है। श्रमिको के चेहरे पर दिखने वाली मायूसी साफ बया करती है कि वे किस तरह बुरी हालात में दिन काटकर अपने घर पहुंचने को व्याकुल है। महोबा के बार्डर पर पहुचने पर उनको थोडा राहत की सास मिली जहां उन्हे प्रशासन द्वारा खाना-पानी तथा ठहरने की व्यवस्था का सहारा प्राप्त हुआ। उचित व्यवस्था देख मजदूरो की आंखो में थोड़ी सी चमक दिखी। जहां उन्हे प्रशासन द्वारा बसो की सहायता से गन्तव्य स्थानो तक पहुंचाने की व्यवस्थाएं की जायेगी।

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