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महोबा -चंदेल नरेश कीर्ति वर्मन ने कराया था ऐतिहासिक कीरतसागर का निर्माण


🗒 मंगलवार, अगस्त 04 2020
🖋 रजत तिवारी, बुंदेलखंड सह संपादक बुंदेलखंड

कोरोना महामारी की भेंट चढ़ गया इस बार का कजली महोत्सव
- रक्षाबंधन के दिन लगता था भव्य कजली महोत्सव
- कीरतसागर केवल तालाब नहीं बल्कि वीरों के पराक्रम का है मूक गवाह

परिचय:- मुख्यालय में बना ऐतिहासिक कीरतसागर।
महोबा। कीरतसागर का नाम आते ही चर्चा यहां के वीरों के पराक्रम की होती है। आल्हा उदल के साथ ही तमाम ऐसे वीर रणबांकुरे हुए जिन्हेांने दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चैहान को भी अपनी वीरता का लोहा मनवाया। कीरतसागर में हुआ भुजरियों का युद्ध आज भी लोगों के दिलों में ताजा है। अफसोस है कि 838 सालों से यहां लग रहा मेला इस बार वैश्विक महामारी कोविड-19 कोरोना वायरस की भेंट चढ़ गया। कीरतसागर केवल तालाब नहीं है बल्कि यहां के बुंदेलों के पराक्रम का गवा है। यदि कोरोना काल न आया होता तो आज कीरत सागर तट पर बुंदेलखंड के सबसे प्राचीन व ऐतिहासिक कजली मेले की तैयारी चल रही होती। घाटों को संवारने व रंगाई-पुताई का कार्य युद्धस्तर पर चलता। रक्षाबंधन के अगले दिन विजय पर्व मनाया जाता है। विजय जुलूस की भव्यता देखते बनती है। हर जगह वीर रस आल्हा की गूंज होती है। वर्ष 1182 में रक्षाबंधन के दिन दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चैहान ने महोबा में चढ़ाई कर दी थी। कीरत सागर तट पर दिल्ली नरेश व महोबा के वीर आल्हा-ऊदल के बीच भीषण युद्ध हुआ था। इसमें आल्हा-ऊदल ने दिल्ली नरेश को धूल चटा दी थी। तभी से ऐतिहासिक कीरत सागर तट पर रक्षाबंधन के दूसरे दिन से ऐतिहासिक कजली मेले का आयोजन होता चला आ रहा है। मेले में प्रतिवर्ष लाखों की भीड़ उमड़ती थी। एक सप्ताह तक दिन रात कई कार्यक्रम चलते थे, लेकिन इस वर्ष कीरत सागर का वैभवशाली अतीत कहीं खो गया है। लोग कीरत सागर को सिर्फ सब्जी मंडी के रूप में जानते हैं। वे रोज सुबह तट पर सब्जी लेने आते हैं और मुंह फेरकर चले जाते हैं। सब्जी वाले गंदगी तट पर ही फेंक देते हैं। कजली मेले को लेकर हर वर्ष एक माह पहले से ही तैयारियां तेज हो जाती थी। आल्हा-ऊदल समेत सभी प्रतिमाओं का रंग रोगन होता था। इस बार कोरोना संक्रमण के चलते मेला स्थगित कर दिया गया है। इसलिए पालिका प्रशासन ने वीर आल्हा ऊदल की प्रतिमाओं की पुताई कराना भी मुनासिब नहीं समझा। इससे लोगों में आक्रोश है।
तेरहवें चंदेल नरेश कीर्ति वर्मन ने सन 1060 में विशाल तालाब का निर्माण कराया था। इसीलिए तालाब का नाम कीर्ति सागर पड़ा जो बाद में कीरत सागर हो गया। कीर्ति वर्मन ने उस समय की चंदनौर नदी के पानी को रोककर तालाब तट पर विशाल बांध बनवाया था। जिसे बनाने में 30 साल का समय लगा। तब आबादी बेहद कम थी लेकिन कीर्ति वर्मन जल संरक्षण को लेकर बहुत गंभीर थे। चंदेल शासकों के पास पारस पथरी थी। जिसके छूने से लोहा सोना बन जाता था। दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चैहान ने हार का बदला लेने के लिए महोबा में चढ़ाई कर दी थी। तब राजा परमाल ने पारस पथरी को कीरत सागर के गहरे पानी में फिकवा दिया था। इस बात का जिक्र आल्हा खंड में भी किया गया है।

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