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मथुरा।पत्रकारिता किसी के प्रमाण-पत्र की मोहताज नहीं जिसके खून में रची-बसी हो पत्रकारिता, वही असलियत पत्रकार


🗒 शनिवार, जून 01 2019
🖋 विजय सिंघल, दैनिक ब्यूरो चीफ मथुरा

ब्यूरो चीफ विजय सिंघल

मथुरा।पत्रकारिता किसी के प्रमाण-पत्र की मोहताज नहीं जिसके खून में रची-बसी हो पत्रकारिता, वही असलियत पत्रकार

मथुरा। पत्रकार तो होता ही है मरने के लिए, चाहे वह मरे या उसका मकसद व दायित्व मरे या उसकी निष्ठा, उसकी आत्मा मरे या फिर उसके हौसले, पत्रकार की ईमानदारी आत्महत्या कर ले या उसकी सत्यनिष्ठा। किसी पर कोई फर्क पड़ता है क्या? सबसे बड़ी बात तो यह है कि पत्रकार पर हमलावर भी अपने चोले बदलने में माहिर पत्रकारिता का कत्ल करने पर आमादा रहते हैं। सरकार चाहे जिसकी हो किंतु उसकी कार्यशैली व ईरादे एक जैसे ही होते हैं, पत्रकारिता को दफन करना। अफसोस तो इस बात का है कि अपनी रोजी-रोटी का जुगाड़ करने वाले तथाकथित पत्रकार हितैषी होने का दंभ भरने के नाम पर आए दिन अमुक अमुक नामों से संगठन बनाए जरूर जाते हैं। किंतु अपने स्वार्थी की पूर्ति के लिए। भरोसे के साथ किसी भी पत्रकार या मीडियाकर्मी के संगठन कम से कम हमारे तो जेहन में नहीं आता कि अमुक संगठन किसी पीड़ित पत्रकार के साथ कंधे से कंधा मिला खड़ा दिखाई दे सकता है। कारण किसी भी संगठन में नेतृत्व का अभाव अथवा सही जुझारू पत्रकारों का न होना या रहना तो धुंधला-धुंधला सा दिखाई पड़ता भी है तो, तथाकथित सांगठनिक लोगों या यूं कहें कि अमुक नाम से संगठनों से या गिरोहों से रिश्ता रखने वाले लंबरदारो द्वारा यह भ्रम फैला दिया जाता है, और उसका उपहास किया जाता है कि अमुक पत्रकार तो पत्रकार ही नहीं है। अथवा तथाकथित पत्रकार है। यह भ्रमजाल पत्रकारिता विभाग में ऐसा नहीं है बल्कि किसी भी दल संगठन या गिरोह में रचा बसा हुआ स्थापित दिखता है। वही कहावत चरितार्थ दिखती है कि "सत्य का मुंह काला झूठे का बोलबाला ऐसी अफवाह लोगों को या पत्रकारों द्वारा पत्रकारों की बुराई करने वाले लोगों को शायद यह ज्ञान नहीं कि पत्रकारिता किसी के प्रमाण पत्र की मोहताज नहीं होती है। जिसके खून में पत्रकारिता रची रची बसी होती है, वही असली पत्रकार होता है। और उसे ही इस बात सीना ठोक कर कहने का अधिकार होता है कि, "पत्रकार जो डर गया तो समझो कि मर गया" सरकार हो या अधिकारी सभी अंग्रेजों का फूट डालो राज करो की नीति पर चल कर हमारे ही छद्मवेशधारी कुछ गिने चुने पत्रकारों को मक्खन पालिश या चमचई के बूते पर अपने पाले में दिखावटी रूप से ही सही करके दूसरे पत्रकारों के खिलाफ बयान बाजी व भड़कातेे हुए व्यक्ति भ्रम पैदा करने का कुसित्त्त्य प्रयास करते हैं ,उसका क्षणिक लाभ भी भरपूर उठाते हैं, उस समय हमारे पत्रकार मित्र भी यह भूल जाते हैं कि आज उनकी पारी है तो कल हमारी भी बारी है।

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