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मथुरा की आज लिखूंगा एक कहानी जो बनेगी इतिहास की कहानी ऐसे थे जांबाज सिपाही जिनको करते हैं हम सलाम हमेशा


🗒 रविवार, जून 02 2019
🖋 विजय सिंघल, दैनिक ब्यूरो चीफ मथुरा

ब्यूरो चीफ विजय सिंघल

मथुरा की आज लिखूंगा एक कहानी जो बनेगी इतिहास की कहानी ऐसे थे जांबाज सिपाही जिनको करते हैं हम सलाम हमेशा

मथुरा की आज लिखूंगा एक कहानी जो बनेगी इतिहास की कहानी ऐसे थे जांबाज सिपाही जिनको करते हैं हम सलाम हमेशाबुुरेेपुलिस लोग अक्सर इस नाम को सुनकर तरह तरह की कहानियां बोला करते हैं कोई इनको दलाल कोई इनको रिश्वतखोर कोई कुछ कोई कुछ बोला करता है लेकिन जब झगड़ा होता है तो यही काम आते हैं कहीं कर्फ्यू लगता है तो व्यवस्था यहीं संभालते हैं तीज त्यौहार हो क्या किसी तरह का और उत्सव हर काम में सुरक्षा देने के लिए यही खड़े होते हैं धूप हो ताप हो बारिश हो हो या कड़ाके की ठंड हो यह हर उस चौराहे पर मिलेंगे जहां हमें खड़ा होने में भी तकलीफ होती है कभी एक्सीडेंट होता है किसी का तो जिस बॉडी को हम छूते भी नहीं है चाहे वह हमारे परिवार की क्यों ना हो उसको यह अपने हाथों से उठाते हैं ऐसे ही न जाने कितने ऐसे कार्य हैं न दीपावली परिवार के साथ बनती है ना होली परिवार के साथ बनती है इनका परिवार आम जनता और हम सब होते हैं लेकिन हम अरे यह तो पुलिसवाला है क्या पुलिसवाला इंसान नहीं होता क्या पुलिसवाला विदेश से आया हुआ या कोई कंप्यूटर या कोई रोबोट तैयार किया हुआ बंदा है पुलिस वाला भी एक गांव के किसान का बेटा है जिस किसान को हम अन्नदाता कहते हैं वहीं सुरक्षा दाता भी होता है क्योंकि उसी के यहां से फौजी आता है उसी के यहां से पुलिसवाला आता है कोई अधिकारी भी होता है क्या लेकर किसान के आगे अब वह भी कहीं ना कहीं किसान का बेटा ही होता है क्यों हम भूल जाते हैं गद्दी पर बैठ कर के हम भी किसी किसान के बेटे हैं कि जनता की तकलीफ समझो और और जनता पुलिस वालों की तकलीफ समझे कि तुम सब भाई हो कहीं बाहर से आए हुए विदेशी नहीं जब हम 8 घंटे की ड्यूटी करके थक जाते हैं तो यह तो 24 घंटे की करते हैं अगर कभी कुछ शब्द गलत निकल गया तो ऐसा कोई गुनाह नहीं होता क्योंकि जिस तकलीफ से यह गुजरते हैं उस तकलीफ को एक बार महसूस करके देखो पता चल जाएगा पुलिस क्या है अगर ईमानदारी की बात आती है तो क्या कोई ₹200 में पूरे महीने आपके एरिया में गश्त लगा सकता है क्या इस आधुनिक समय में साइकिल से दस्त लग सकती है जिस जमाने में अपराधी अपाचे पल्सर और न जाने कौन सी स्पोर्ट्स वाइके यूज कर रहे हैं उसमें आज भी पुलिस को साइकिल भत्ता मिलता है बात फरवरी जाट आरक्षण हरयाणा आन्दोलन की है , NH 2 हमने रोड जाम किया हुआ था नौजवानों के साथ हम सभी आवेश एवं आक्रोश मेंं थे , कि बिना पूर्व चेतावनी के हरयाणा मेंं हमारे जाट भाइयों को गोलियों से भून दिया गया था ,ना रबर की बुलेट चलाई गईं थीं , ना आँसू गैस के गोले दागे गए थे ,ना पानी की बौछार ही की गईं थीं और ना हीं लाठी चार्ज किया पूरा जाट समाज सरकारी हिंसा के खिलाफ उबाल खा रहा था ऐसे मेंं मथुरा कैसे अछूता रहता ? तभी आँखों पर चश्मा लगाएँ दो अधिकारी हमारे सामने अचानक प्रकट होते हैं , तत्कालीन सिटी मजिस्ट्रेट विजय सिंह जी और दूसरे पुलिस अधिकारी भाई S.P.city मुकुल द्विवेदी जी,  जिनसे हम बहुत जोश और आक्रोश मेंं बात कर रहे थे ! लगभग हमारी ऊँगली भी उनकी आँख के करीब तक जाती थी ! हमने उनसे सवाल किये ऐसे सीधे गोलियां चलाना कहाँ तक सही है ? 

उन्होंने मुक्त कण्ठ से स्वीकार किया था,  कि गोली से पहले के विकल्प अपनाए जा सकते थे जो हुआ हरयाणा मेंं ग़लत हुआ है !  तत्काल हमने कहा यदि आप ग़लत मानते हैं इस गोलीकाण्ड को तो हमारे भाइयों के लिए अपनी पुलिस के साथ 2 मिनट का मौन धारण कीजिए क्या व्यक्तित्व था ? तत्कालीन S.P.city भाई मुकुल द्विवेदी जी का उन्होंने पूरे पुलिस बल के साथ हमारे भाइयों को ॐशाँति के मंत्र बोलकर मौन धारण बीच रोड पर किया था ! बराबर विनम्रतापूर्वक रोड जाम खुलवाने का आग्रह करते रहे जबकि तत्कालीन सिटी मजिस्ट्रेट विजय सिंह जी सजातीय होने की वजह से हमसे इतना ही कहते कि जो आपकी पीड़ा है वोही मेरी पीड़ा है , प्लीज रोड जाम खोल दें फ़िर 45 मिनट तक बंद कमरे मेंं उन्होंने मोबाइल नंबरों के आदान प्रदान किये और अपनी मनमोहक हँसी और विनम्रता से हमें रोड से कब हटवा दिया हमें पता ही नहीं चला जबकि हमारे सभी नौजवानों और बुजुर्गों ने सिर से कफन बांधकर आए हैं ! ये तक कह दिया था  और रोड पर दोनों तरफ सो गए और हम माइक लेकर जीप पर चढ़ गए ! ऐसे महान व्यक्तित्व के धनी भाई शहीद S.P.City मुकुल द्विवेदी जी के साथ संतोष यादव जी को भी व्रजवासियो की तरफ से श्रंद्धाजलि अर्पित है।

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