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सुप्रीम कोर्ट ने मौसी से लेकर दादा-दादी को सौंपी अनाथ बच्चे की कस्टडी


🗒 गुरुवार, जून 09 2022
🖋 विक्रम सिंह यादव, प्रधान संपादक
सुप्रीम कोर्ट ने मौसी से लेकर दादा-दादी को सौंपी अनाथ बच्चे की कस्टडी

नई दिल्ली। एक अनाथ बच्चे की ज्यादा अच्छी देखभाल मौसी कर सकती है या दादा-दादी। गुजरात हाई कोर्ट का मानना था कि मौसी कमाऊ है इसलिए वह बेहतर देखभाल करेगी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट मानता है कि दादा-दादी ज्यादा अच्छी तरह जिम्मेदारी निभाएंगे क्योंकि दादा-दादी को पोते से ज्यादा लगाव होता है। वे अपने पोते की ज्यादा अच्छी देखभाल कर सकते हैं, उनकी क्षमता पर संदेह नहीं किया जा सकता। कहा जाता है कि मूल से ब्याज ज्यादा प्यारा होता है। भावनात्मक रूप से भी हमेशा दादा-दादी अपने पोते की ज्यादा बेहतर देखभाल करेंगे। इन टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने कोविड महामारी में माता-पिता खोकर अनाथ हुए पांच साल के बच्चे की कस्टडी मौसी से लेकर दादा-दादी को सौंप दी। हालांकि कोर्ट ने मौसी को बच्चे से मिलने और वीडियो काल करने का अधिकार दिया है।ये आदेश गुरुवार को जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस अनिरुद्ध बोस की पीठ ने कोविड में अनाथ हुए पोते की कस्टडी मांगने वाली दादा की याचिका स्वीकार करते हुए दिया। सुप्रीम कोर्ट ने बच्चे की कस्टडी दादा-दादी के बजाय मौसी को सौंपने का गुजरात हाई कोर्ट का आदेश रद कर दिया। हाई कोर्ट ने बच्चे की कस्टडी मौसी को इस आधार पर दे दी थी कि मौसी अविवाहित है, सरकारी नौकरी में है और अच्छा वेतन पाती है। उसका बड़ा परिवार है, वह बच्चे की ज्यादा अच्छी देखभाल कर सकती है। जबकि दादा-दादी 71 और 63 वर्ष के हैं और सेवानिवृत्त हो चुके हैं, उनका खर्च पेंशन से चलता है। हालांकि हाई कोर्ट ने दादा-दादी को पोते से मिलने का अधिकार दिया था। दादा ने हाई कोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। बच्चे के पिता की पिछले साल 13 मई और मां की 12 जून को मृत्यु हो गई थी।सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि बच्चे ने दादा-दादी के साथ रहने की इच्छा जताई थी और 23 दिसंबर, 2021 के आदेश में यह बात दर्ज भी है। इसके अलावा हाई कोर्ट के अंतरिम आदेश से बच्चे की कस्टडी दादा-दादी के पास थी और यह नहीं कहा गया कि इस बीच दादा-दादी ने बच्चे की ठीक से देखभाल नहीं की। बल्कि बच्चे ने ही दादा-दादी के साथ रहने की इच्छा जताई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट ने बच्चे की कस्टडी मौसी को सौंपने के जो कारण दिए हैं, हो सकता है सुसंगत हों, लेकिन मुनासिब नहीं लगते। यह नहीं माना जा सकता कि मौसी अविवाहित, कमाऊ और दादा-दादी से कम उम्र की है तो दादा-दादी से ज्यादा बेहतर देखभाल कर लेगी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमारे समाज में अभी भी दादा-दादी अपने पोते की ज्यादा बेहतर देखभाल करते हैं। कोर्ट ने कहा कि दादा-दादी अहमदाबाद में रहते हैं, जबकि मौसी दाहोद मे रहती है। अहमदाबाद मेट्रो सिटी है वहां बच्चे को अच्छी शिक्षा मिल सकती है। मौसी नौकरीपेशा है, जबकि दादा-दादी रिटायर्ड हैं ऐसे में वे मौसी की अपेक्षा बच्चे के साथ ज्यादा वक्त बिता सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बच्चे की कस्टडी दादा-दादी को नहीं सौंपने का आय, उम्र या बड़ा परिवार एकमात्र आधार नहीं हो सकता।सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट ने कस्टडी तय करने के जो प्रयास किए, वह उसकी सराहना करता है और मानता है कि चुनाव मुश्किल था। लेकिन हाई कोर्ट ने कस्टडी दादा-दादी को न सौंपकर भूल की है। उनका मानना है कि अगर उपरोक्त आधारों पर दादा-दादी और मौसी के बीच तुलना की जाए तो दादा-दादी का पलड़ा भारी होगा। हालांकि वह यह नहीं कह रहे कि मौसी अपनी बहन के बेटे की अच्छी देखभाल नहीं करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने बच्चे की कस्टडी दादा-दादी को सौंपते हुए कहा कि यह आदेश गार्जियन और वार्ड एक्ट के तहत कस्टडी के लंबित मुकदमे के अंतिम फैसले के अधीन होगा। कोर्ट ने दादा को आदेश दिया कि वह बच्चे की बेहतर शिक्षा का इंतजाम करें। मौसी को बच्चे से मिलने, वीडियो काल पर बात करने की इजाजत होगी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह दादा-दादी और नाना-नानी, मौसी के परिवार से अनुरोध करते हैं कि वे बच्चे के हित में पूर्व की कड़वाहट भूलकर मिलजुल कर अच्छे रिश्ते बनाएं और पिछली बातें भूलकर भविष्य की ओर देखें।

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