यूनाइट फॉर ह्यूमैनिटी हिंदी समाचार पत्र

RNI - UPHIN/2013/55191 (साप्ताहिक)
RNI - UPHIN/2014/57987 (दैनिक)
RNI - UPBIL/2015/65021 (मासिक)

मनी लांड्रिंग एक जघन्य अपराध, यह आतंकवाद - सुप्रीम


🗒 बुधवार, जुलाई 27 2022
🖋 विक्रम सिंह यादव, प्रधान संपादक
मनी लांड्रिंग एक जघन्य अपराध, यह आतंकवाद -  सुप्रीम

नई दिल्‍ली, । सुप्रीम कोर्ट  ने बुधवार को कहा कि मनी लांड्रिंग एक जघन्य अपराध है जो न केवल किसी देश के सामाजिक और आर्थिक ताने-बाने को प्रभावित करता है वरन आतंकवाद और मादक पदार्थों की तस्करी जैसे अन्य गंभीर अपराधों को भी बढ़ावा देता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी बताया कि प्रिवेंशन आफ मनी लान्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) 2002 वित्तीय प्रणालियों पर अंतरराष्ट्रीय प्रभाव वाली गतिविधियों से निपटने के लिए एक विशेष कानून है।इसके साथ ही न्यायमूर्ति एएम खानविलकर (Justice AM Khanwilkar) की अध्यक्षता वाली पीठ ने पीएमएलए के कुछ प्राविधानों की वैधता को बरकरार रखते हुए कहा कि यह कानून मनी लान्ड्रिंग को रोकने और अपराध की आय से संबंधित गतिविधियों में लिप्त लोगों पर मुकदमा चलाने के लिए एक व्यापक कानून की तत्काल आवश्यकता को पूरा करने के लिए बनाया गया था।न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी और न्यायमूर्ति सीटी रविकुमार की पीठ ने कहा कि मनी लांड्रिंग कोई सामान्य अपराध नहीं है। मनी लान्ड्रिंग को रोकने के लिए एक व्यापक कानून बनाने की जरूरत दुनिया भर में महसूस की गई, क्योंकि उनकी अखंडता और संप्रभुता सहित देशों की वित्तीय प्रणालियों के लिए गंभीर खतरा है। संसद ने गंभीर आर्थिक परिणामों वाले अपराध के खतरे से सख्ती से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता के परिणामस्वरूप पीएमएलए को परित किया।सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को प्रिवेंशन आफ मनी लांड्रिंग एक्ट (पीएमएलए), 2002 के तहत प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के गिरफ्तारी, संपत्ति कुर्क करने, तलाशी और जब्ती के अधिकारों को बरकरार रखा। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि कानून की धारा-19 के तहत ईडी का गिरफ्तारी का अधिकार मनमाना नहीं है।कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम समेत 240 से ज्यादा नेताओं, व्यक्तियों और संगठनों की 200 से ज्यादा याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस दिनेश महेश्वरी और जस्टिस सीटी रविकुमार की पीठ ने कहा कि दुनियाभर में यह अनुभव आम है कि मनी लांड्रिंग वित्तीय प्रणाली के बेहतर कामकाज के लिए खतरा हो सकती है। यह जघन्य अपराध है जो न सिर्फ देश के सामाजिक और आर्थिक ताने-बाने को प्रभावित करता है, बल्कि अन्य जघन्य अपराधों को भी बढ़ावा देता है। इन याचिकाओं में पीएमएलए के विभिन्न प्रविधानों पर सवाल उठाए गए थे जिनके बारे में विपक्ष अक्सर दावा करता है कि सरकार अपने राजनीतिक विरोधियों के विरुद्ध उनका हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रही है।पीएमएलए के कुछ प्रविधानों की वैधता को बरकरार रखते हुए पीठ ने अपने आदेश में कहा कि 2002 के एक्ट के तहत अधिकारी, पुलिस अधिकारी नहीं हैं और इंफोर्समेंट केस इंफारमेशन रिपोर्ट (ईसीआइआर) की बराबरी सीआरपीसी के तहत एफआइआर से नहीं की जा सकती। हर मामले में संबंधित व्यक्ति को ईसीआइआर की कापी देना आवश्यक नहीं है और गिरफ्तारी के समय ईडी द्वारा गिरफ्तारी का आधार बताना पर्याप्त है। इस मामले में याचिकाकर्ताओं ने ईसीआइआर का विवरण उजागर नहीं करने की ईडी की शक्ति को चुनौती दी थी। उनका कहना था कि इससे आरोपित के मौलिक अधिकारों का हनन होता है।पीठ ने कहा, 'ईसीआइआर ईडी का आंतरिक दस्तावेज है और यह तथ्य कि अनुसूचित अपराध के संबंध में एफआइआर दर्ज नहीं की गई है, अपराध से अर्जित संपत्ति की कुर्की की कार्रवाई शुरू करने के लिए धारा-48 में संदर्भित अधिकारियों द्वारा जांच शुरू करने की राह में बाधा नहीं बनेगा।'शीर्ष अदालत ने कहा कि पीएमएलए की धारा-45 उचित है और यह मनमानी या अनुचित नहीं है। पीएमएलए की यह धारा संज्ञेय और गैर-जमानती अपराधों से संबंधित है और इसमें जमानत के लिए दोहरी शर्ते हैं।याचिकाकर्ताओं ने आरोपित के लिए कानून में कड़ी जमानत शर्तो को भी चुनौती दी थी। धारा-45 कहती है कि जब लोक अभियोजक आरोपित की जमानत याचिका का विरोध करता है तो अदालत तभी राहत दे सकती है जबकि वह इस बात से संतुष्ट हो कि यह विश्वास करने के उचित कारण हैं कि आरोपित उक्त अपराध करने का दोषी नहीं है और जमानत प्रदान करने पर उसके द्वारा कोई अपराध करने की आशंका नहीं है।पीठ ने अपने 545 पृष्ठ के फैसले में कहा, '2002 के अधिनियम की धारा-19 (गिरफ्तारी की शक्ति) की संवैधानिक वैधता को चुनौती भी खारिज की जाती है। धारा-19 में कड़े सुरक्षा उपाय किए गए हैं। इस प्रविधान में कुछ भी मनमानी के दायरे में नहीं आता।'शीर्ष अदालत ने कहा कि मनी लांड्रिंग में शामिल संपत्ति की कुर्की से संबंधित अधिनियम की धारा-5 संवैधानिक रूप से वैध है। पीठ ने कहा, 'इसमें व्यक्ति के हितों को सुरक्षित रखने के संतुलित प्रबंध हैं साथ ही यह सुनिश्चित किया गया है कि अपराध से अर्जित आय से 2002 के अधिनियम में दिए गए तरीके से निपटा जा सके।'इस सवाल पर कि क्या पीएमएलए में कुछ संशोधनों को संसद द्वारा धन विधेयकों के माध्यम से नहीं किया जा सकता था, पीठ ने कहा कि इसकी जांच नहीं की गई है और सात न्यायाधीशों की बड़ी पीठ के फैसले के साथ या बाद में विचार के लिए छोड़ दिया गया है जो मामले को देख रही है।पीठ ने आत्म-दोष से संबंधित पीएमएलए की धारा-24 का भी समर्थन किया। यह धारा कहती है कि जब किसी व्यक्ति पर मनी लांड्रिंग का आरोप लगाया जाता है, तो यह साबित करने का भार आरोपित पर होगा कि अपराध की आय दरअसल बेदाग संपत्ति है।पीठ ने कहा कि कानून की धारा-24 का अधिनियम के उद्देश्यों और लक्ष्यों के साथ उचित संबंध है और इसे असंवैधानिक नहीं माना जा सकता। सीआरपीसी में आत्म-दोष के विरुद्ध नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की गई है। सीआरपीसी की धारा-162 कहती है कि हर व्यक्ति पुलिस अधिकारी के सभी प्रश्नों का ईमानदारी से जवाब देने के लिए बाध्य है, सिवाय उन सवालों के जिनके जवाब व्यक्ति को आपराधिक आरोप, दंड या जब्ती की ओर ले जाते हों।पीठ ने कहा कि पीएमएलए के तहत अधिकारियों द्वारा दर्ज बयान संविधान के अनुच्छेद-20(3) और अनुच्छेद-21 से प्रभावित नहीं होते। अनुच्छेद-20(3) कहता है कि किसी भी अपराध के आरोपित को अपने ही विरुद्ध गवाह बनने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। जबकि अनुच्छेद-21 जीवन और निजी स्वतंत्रता से संबंधित है।पीठ ने माना कि अपीलीय न्यायाधिकरण में रिक्तियों के कारण अन्याय होने की याचिकाकर्ताओं की गंभीर चिंता उचित है। इस पर पीठ ने कहा, 'हम इस संबंध में शीघ्रता से सुधारात्मक उपाय करने के लिए कार्यपालिका पर प्रभाव डालना आवश्यक समझते हैं।'शीर्ष अदालत ने कहा कि झूठी सूचना या सूचना देने में विफलता के संबंध में दंड से संबंधित अधिनियम की धारा-63 किसी भी तरह मनमानी नहीं है। पीठ ने कहा, 'अनुसूचित अपराध की प्रकृति के संदर्भ में सजा की आनुपातिकता के बारे में तर्क पूरी तरह निराधार है और खारिज किया जाता है।'शीर्ष अदालत ने कहा कि उसे धारा-44 को चुनौती देने में कोई मेरिट नहीं मिली, जो विशेष अदालतों द्वारा विचारणीय अपराधों से संबंधित है। पीठ ने कहा, '2002 के अधिनियम की अनुसूची में किसी विशेष अपराध को शामिल करना या बाहर करना विधायी नीति का मामला है; और किसी भी गंभीर अपराध की प्रकृति या वर्ग का अनुसूची या उसके तहत किसी दिशानिर्देश की वैधता पर कोई असर नहीं पड़ता।'