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अयोध्या मामले में मुस्लिम पक्ष की सुप्रीम कोर्ट में दलील, कहा- ढांचे के नीचे नहीं था विशाल मंदिर


🗒 सोमवार, सितंबर 02 2019
🖋 विक्रम सिंह यादव, प्रधान संपादक

अयोध्या राम जन्मभूमि पर मस्जिद का दावा कर मालिकाना हक मांग रहे मुस्लिम पक्ष ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में हिन्दुओं के मुकदमें का विरोध करते हुए कहा कि वहां पर ढांचे के नीचे विशाल मंदिर नहीं था। बाबर ने मंदिर तोड़ कर मस्जिद नहीं बनाई थी।उन्होंने यह भी कहा कि हिन्दुओं ने 1934 में मस्जिद पर हमला किया, 1949 में वे जबरदस्ती घुसे और 1992 में मस्जिद ढहा दी और अब वे कोर्ट में अपने अधिकारों की रक्षा की दुहाई दे रहे हैं। मामले पर मंगलवार को भी बहस जारी रहेगी।ये दलीलें सोमवार को सुन्नी वक्फ बोर्ड और अन्य मुस्लिम पक्षों की ओर से पक्ष रखते हुए वरिष्ठ वकील राजीव धवन और एजाज मकबूल ने पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के सामने दीं। उन्होंने हाईकोर्ट के आदेश पर सवाल उठाते हुए कहा कि हाईकोर्ट का आदेश अनुमानों और संभावनाओं पर आधारित है।हाईकोर्ट के न्यायाधीश मामले से जुड़े साक्ष्यों को लेकर निश्चित नहीं थे इसलिए उन्होंने भारत पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) की खुदाई की आपारंपरिक तकनीक पर ध्यान केन्दि्रत किया। धवन ने कहा कि बाबर ने मंदिर तोड़ कर मस्जिद नहीं बनाई थी। ढांचे के नीचे विशाल मंदिर के अवशेष नहीं मिले हैं।उन्होंने एएसआइ रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए कहा कि एएसआइ को खुदाई मे कई परतें मिली हैं एक चीज एक पर्त में और दूसरी चीज दूसरी पर्त में मिली है अलग अलग परतों (लेयर) में मिले अवशेषों को मिला कर एक यह नहीं कहा जा सकता कि विवादित ढांचा के नीचे विशाल ढांचा था।धवन ने कहा कि इतिहास देखा जाए तो हिन्दू किस तरह की राहत मांग रहे है। उन्होंने 1934 में मस्जिद पर हमला किया, 1949 मे जबरदस्ती घुसे (केस के मुताबिक 22-23 दिसंबर 1949 की रात मंदिर में मूर्तियां रखी गईं थी) इसके बाद छह दिसंबर 1992 को इन्होंने मस्जिद पूरी तरह ढहा दी और अब ये कोर्ट में अपने अधिकारों और हितों को संरक्षित करने की मांग कर रहे हैं।इस पर जस्टिस अशोक भूषण ने धवन से कहा कि इन सब बातों पर जाने की जरूरत नहीं है वह उन्हीं चीजों का जिक्र करें जो मामले मे सुसंगत हो। धवन ने कहा कि हिन्दू महासभा के वकील हरिशंकर जैन ने संविधान लागू होने के बाद अनुच्छेद 13 और 25 में हिन्दुओं के अधिकार पुनसर््थापित करने की मांग की है इसलिए वह ये दलीलें दे रहे हैं।धवन ने रामलला के मुकदमे का विरोध करते हुए कहा कि रामलला यानी देवता की ओर से पहली बार मुकदमा 1989 में आया। इतना ही नहीं यहां सेवापूजा का अधिकार मांग रहा निर्मोही अखाड़ा स्वयं देवता के मुकदमें के खिलाफ है। धवन के कहा कि देवता न्यायिक व्यक्ति होता है, लेकिन देवता मुकदमा नहीं लड़ सकता। परिक्रमा को साक्ष्य नही माना जा सकता।

अयोध्या मामले में मुस्लिम पक्ष की सुप्रीम कोर्ट में दलील, कहा- ढांचे के नीचे नहीं था विशाल मंदिर

धवन ने विदेशी यात्रियों और इतिहासकारों की वर्णन को साक्ष्य के तौर पर स्वीकार किये जाने का विरोध करते हुए कहा कि हर एक के अपने विचार होते हैं। आज के इतिहासकार के अलग विचार हो सकते हैं। इतिहास को हिस्टोरियोग्राफी के बगैर नहीं स्वीकार किया जा सकता।जब धवन ने इतिहासकारों के वर्णन पर सवाल उठाए तो जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि सुन्नी वक्फ बोर्ड के मुकदमें में भी तीन शिलालेखों पर भरोसा किया गया है। शिलालेख भी इतिहास का ही हिस्सा है ऐसे में उनकी दलील उन्हीं के मुकदमे के खिलाफ जा रही है।धवन ने कहा कि वह यह नहीं कह रहे कि हमारे इतिहास को स्वीकार किया जाए या उनके इतिहास को। उनका कहना है कि कोर्ट को 1857 से मुद्दे पर विचार करना चाहिए जबसे तारीखी साक्ष्य उपलब्ध हैं। उन्होंने ब्रिटिश गैजेटियर पर भी सवाल उठाए।धवन ने हिन्दू पक्ष की ओर से बाबर को हमलावर बताए जाने की दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि वह इस बात पर नहीं जा रहे कि कौन बाहरी हमलावर था क्योंकि अगर इस पर जाएंगे तो बहुत हमलावर आए हैं।अखिल भारत हिन्दू महासभा के वकील अनूप बोस ने कहा कि आक्रमणकारी का किसी चीज पर मालिकाना हक नहीं होता। सबूतों मे यह साबित हुआ है कि वहां पर पहले मंदिर था जिसे तोड़ कर बाबर के कमांडर मीर बाकी ने 1528 में मस्जिद बनाई थी। उन्होंने कहा कि वहां देवता रामलला प्राचीन काल से स्थापित हैं उनके ऊपर किसी तरह के अधिकार को स्थापित नहीं किया जा सकता।राजीव धवन ने कोर्ट से कहा कि वह लगातार पांच दिन बहस नहीं कर पाएंगे उन्हें एक दिन का विश्राम चाहिए होगा। धवन ने बुधवार को विश्राम मांगा था लेकिन कोर्ट ने उन्हें शुक्रवार को विश्राम की इजाजत दे दी।तमिलनाडु के एक प्रोफेसर पर धमकाने का आरोप लगाते हुए राजीव धवन की ओर से दाखिल की गई अवमानना याचिका पर कोर्ट मंगलवार को सुनवाई करेगा। सोमवार को कपिल सिब्बल ने याचिका का जिक्र करते हुए कोर्ट से सुनवाई मांगी थी जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।

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