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गांधी के खिलाफ इस्तेमाल हुए राजद्रोह कानून को खत्म क्यों नहीं करते - सुप्रीम कोर्ट


🗒 गुरुवार, जुलाई 15 2021
🖋 विक्रम सिंह यादव, प्रधान संपादक
गांधी के खिलाफ इस्तेमाल हुए राजद्रोह कानून को खत्म क्यों नहीं करते - सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने आइपीसी धारा 124ए (राजद्रोह) के दुरुपयोग और इस पर कार्यपालिका की जवाबदेही न होने पर चिंता जताते हुए केंद्र सरकार से सवाल किया कि क्या आजादी के 75 साल बाद भी इस कानून की जरूरत है। कोर्ट ने कहा कि इस कानून को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। यह कानून अंग्रेजों के समय का है। वे स्वतंत्रता आंदोलन दबाने के लिए इसका प्रयोग करते थे। उन्होंने महात्मा गांधी को चुप कराने के लिए इसका प्रयोग किया। आजादी के इतने साल बाद भी इसकी जरूरत है। सरकार ने बहुत से पुराने कानून रद किये हैं लेकिन इस पर ध्यान नहीं दिया। इसका बहुत दुरुपयोग होता है। ये कानून लोगों और संस्थाओं के लिए बड़ा खतरा है। कोर्ट ने राजद्रोह कानून पर विचार करने का मन बनाते हुए केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। हालांकि जवाब के लिए कोई अंतिम तिथि नहीं दी है।कानून के दुरुपयोग पर चिंता जताते हुए ये तीखी टिप्पणियां चीफ जस्टिस एनवी रमना की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने राजद्रोह कानून पर सवाल उठाने वाली एक याचिका पर सुनवाई के दौरान कीं। कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया और इसी मुद्दे पर पहले से लंबित याचिकाओं को भी इसी के साथ सुनवाई के लिए संलग्न करने का आदेश दिया।मौजूदा याचिका मेजर जनरल (अवकाश प्राप्त) एसजी वोमबटकेरे ने दाखिल की है। याचिका में राजद्रोह कानून को रद करने की मांग की गई है। एक याचिका एडीटर गिल्ड की ओर से भी दाखिल की गई है। गुरुवार को वकील श्याम दीवान ने एडीटर गिल्ड की याचिका का जिक्र करते हुए कहा कि उसमें कानून को रद करने और दिशा निर्देश जारी करने की मांग है। उस पर भी इसके साथ सुनवाई होनी चाहिए। बुधवार को कोर्ट ने अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल को सेवानिवृत सैन्य अधिकारी की याचिका पर सुनवाई में कोर्ट की मदद करने को कहा था।गुरुवार को अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कोर्ट को बताया कि इसी तरह की दो अन्य याचिकाएं भी लंबित हैं जिन पर दूसरी पीठें सुनवाई कर रही हैं। उन मामलों में कोर्ट ने जवाब दाखिल करने के निर्देश दिये हैं। वेणुगोपाल की दलील पर चीफ जस्टिस ने कहा कि उन्हें इस बात की जानकारी है और वे देखेंगे कि क्या मामलों को एक साथ सुनवाई के लिए संलग्न किया जा सकता है अथवा और क्या हो सकता है। सैन्य अधिकारी के वकील ने कहा कि उनकी याचिका बाकी से अलग है। इस पर भी सुनवाई होनी चाहिए।जस्टिस रमना ने कहा कि कहा कि अगर इतिहास देखा जाए तो इस कानून में दोषी साबित होने की दर बहुत कम है। लेकिन इसका प्रयोग ऐसे हो रहा है जैसे किसी बढ़ई को लकड़ी का टुकड़ा काटने के लिए आरी दी जाए और वह पूरा जंगल ही काट डाले। आइटी एक्ट की धारा 66ए का उदाहरण देते हुए कोर्ट ने कहा कि उस कानून के रद होने के बाद भी उसमें हजारों केस दर्ज हुए।पीठ ने कहा कि अगर पुलिस किसी को फंसाना चाहती है तो धारा 124ए भी लगा देती है। जिस पर भी यह धारा लगती है वह डर जाता है। इन मुद्दों पर विचार किए जाने की जरूरत है। हमारी चिंता कानून के दुरुपयोग और कार्यपालिका की कोई जवाबदेही न होने को लेकर है। पीठ ने कहा कि वह सभी मामलों की एक साथ संलग्न कर सुनवाई करेगी।पीठ की टिप्पणी पर केके वेणुगोपाल ने कहा कि कानून रद करने की जरूरत नहीं है। सख्त दिशानिर्देश तय करने से भी उद्देश्य की पूर्ति हो सकती है। पीठ ने कहा कि एक गुट दूसरे गुट के लोगों को फंसाने के लिए इस कानून का उपयोग कर सकता है। ये लोगों लिए खतरा है। पीठ ने याचिका का प्रामाणिक और याचिकाकर्ता को वास्तविक बताते हुए कहा कि उसने अपना पूरा जीवन देश की सेवा में समर्पित किया है। हम यह नहीं कह सकते कि यह प्रेरित याचिका है।पूर्व केन्द्रीय मंत्री अरण शौरी ने गुरवार को सुप्रीम कोर्ट का रख कर राजद्रोह कानून को असंवैधानिक घोषिषत करने का अनुरोध किया। याचिका, शौरी और गैर सरकारी संस्था ([एनजीओ)] कामन काज की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषषण ने दायर की है। यह याचिका ऐसे दिन दायर की गई है, जब चीफ जस्टिस एनवी रमना की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस कानून के भारी दुरपयोग पर चिंता जाहिर की। शौरी की याचिका में दावा किया गया है कि राजद्रोह की परिभाषषा ([आइपीसी की धारा 124 ए)] अस्पष्ट है। याचिका में कहा गया है कि यह एक औपनिवेशिक कानून है और इसका इस्तेमाल भारत में ब्रिटिश शासन द्वारा असहमति की आवाज को दबाने में किया जाता था।

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