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गुरुकुल, मदरसा, मिशनरी और वैदिक स्कूल के लिए समान शिक्षा संहिता की मांग


🗒 शनिवार, सितंबर 25 2021
🖋 विक्रम सिंह यादव, प्रधान संपादक
गुरुकुल, मदरसा, मिशनरी और वैदिक स्कूल के लिए समान शिक्षा संहिता की मांग

नई दिल्ली, । सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल हुई है, जिसमें गुरुकुल, मदरसा, मिशनरी और वैदिक स्कूल के लिए समान शिक्षा संहिता लागू करने की मांग की गई है। याचिका में अनुरोध किया गया है कि गुरुकुल और वैदिक स्कूलों को मदरसा और मिशनरी स्कूलों के समान मान्यता दी जाए। समान शिक्षा संहिता लागू करने की मांग वाली यह याचिका वकील और भाजपा नेता अश्वनी कुमार उपाध्याय ने दाखिल की है। याचिका में केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय, कानून मंत्रालय, शिक्षा मंत्रालय, अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय और विधि आयोग को पक्षकार बनाया गया है।इसमें मांग है कि सुप्रीम कोर्ट घोषित करे कि संविधान के अनुच्छेद 29, 30 के अंतर्गत जिस तरह मुस्लिमों को मदरसा और ईसाइयों को मिशनरी स्कूल खोलने का अधिकार है, उसी तरह हिंदुओं को गुरुकुल और वैदिक स्कूल खोलने का अधिकार प्राप्त है। कहा गया कि वर्तमान समय में मदरसा और मिशनरी स्कूल के शैक्षणिक प्रमाणपत्र को सरकारी नौकरियों में मान्यता प्राप्त है, लेकिन गुरुकुल और वैदिक स्कूल के छात्रों को योग्य नहीं माना जाता। मदरसा और मिशनरी स्कूल धार्मिक शिक्षा भी देते हैं। फिर भी उन्हें सरकार मान्यता और फंड भी देती है। जबकि गुरुकुल और वैदिक स्कूलों को न ही मान्यता दी जाती है और न ही फंड दिया जाता है।इसमें कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद 29 में सिर्फ अल्पसंख्यकों को ही नहीं बल्कि देश के सभी नागरिकों को अपनी संस्कृति, भाषा और स्कि्रप्ट को संरक्षित करने का अधिकार है। इसी तरह अनुच्छेद 30 में केवल अल्पसंख्यकों को नहीं बल्कि बहुसंख्यकों को भी अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और प्रबंधन का अधिकार मिला हुआ है। इसलिए केंद्र सरकार का दायित्व है कि वह गुरुकुल, वैदिक स्कूल, मदरसा और मिशनरी स्कूल के लिए अनुच्छेद 14, 15, 16, 19, 29 और 30 की भावना के अनुकूल समग्र और समान शिक्षा संहिता बनाए।गुरुकुल और वैदिक स्कूल वैज्ञानिक और पंथनिरपेक्ष शिक्षा दे रहे हैं। फिर भी उन्हें मदरसा और मिशनरी स्कूलों के समान नहीं माना जाता। याचिका में कहा गया है कि लगातार संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 की गलत व्याख्या की जा रही है, जिसके कारण बहुसंख्यक समुदाय अपने सांस्कृतिक और शैक्षणिक अधिकारों से वंचित है। अनुच्छेद 29 और 30 में जो अल्पसंख्यक शब्द का उपयोग किया गया है, वह केवल देश के धार्मिक आधार पर हुए विभाजन के बाद भारत में रह रहे अल्पसंख्यकों को एक अतिरिक्त सुरक्षा देने के लिए किया गया था।याचिकाकर्ता का कहना है कि यह कोई विशेष अधिकार नहीं है, बल्कि एक अतिरिक्त सुरक्षा दी गई है। अल्पसंख्यक मंत्रालय 25,000 मदरसों को मान्यता देता है। इसके अलावा जमीयत उलमा-ए- हिंद के भी पूरे देश में करीब 20,000 मदरसे हैं जो कि शिक्षा मंत्रालय के दिशा-निर्देशों का पालन नहीं करते। इसके बावजूद उनके छात्रों को सरकारी नौकरियों में राज्य शिक्षा बोर्डों और सीबीएसई बोर्ड से पास छात्रों के बराबर माना जाता है। लेकिन गुरुकुल और वैदिक स्कूल के छात्रों को यह मान्यता नहीं है।

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