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UP पुलिस की साप्ताहिक अवकाश योजना ‘छुट्टी’ पर है


🗒 सोमवार, दिसंबर 24 2018
🖋 विक्रम सिंह यादव, प्रधान संपादक
UP पुलिस की साप्ताहिक अवकाश योजना ‘छुट्टी’ पर है

 राजधानी के पुलिसकर्मियों के लिए वर्ष 2013 साप्ताहिक अवकाश की सौगात लेकर आया था। गोमतीनगर और चिनहट कोतवाली से साप्ताहिक अवकाश की शुरुआत हुई थी। तत्कालीन डीआइजी नवनीत सिकेरा के हटते ही साप्ताहिक अवकाश की योजना फाइलों में कैद हो गई।

मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार ने पुलिसकर्मियों को साप्ताहिक अवकाश का तोहफा दिया तो उत्तर प्रदेश में एक बार फिर पुलिस महकमे में छुट्टी को लेकर हलचल बढ़ गई। यहां भी नए साल में पुलिसकर्मी साप्ताहिक अवकाश को लेकर आस लगाए बैठे हैं। पुलिसकर्मियों के बामुश्किल छुट्टी मिलने के ये दो मामले तो महज बानगीभर हैं। साप्ताहिक अवकाश तो दूर की बात जरूरी काम के लिए भी यहां पुलिसकर्मियों को छुट्टी के लिए जुगाड़ लगाना पड़ता है। आइजी रेंज कार्यालय में एक मेडिकल सर्वे में छुट्टी न मिलने से कई पुलिसकर्मियों के अवसाद और बीमार होने होने की बात सामने आई थी। सरकारी विभागों में सिर्फ पुलिस महकमा ही ऐसा है, जहां 365 दिन की ड्यूटी करने वाले पुलिसकर्मियों को साप्ताहिक अवकाश तक नहीं मिलता। लखनऊ में ही किसी को सालभर से तो किसी को छह महीने से छुट्टी नहीं मिली।पुलिसकर्मियों को सालभर में 30 सीएल और 30 ईएल दी जाती हैं। वहीं पूर्व में दिए गए आदेश में साप्ताहिक अवकाश की बात हवाहवाई साबित हुई। इससे पुलिसकर्मी और उनके परिवारीजन आहत हैं। आलम यह है कि स्वीकृत छुट्टी भी नहीं मिल पा रही हैं।

हजरतगंज कोतवाली में तैनात एक महिला सिपाही सप्ताहभर पूर्व गिड़गिड़ाते हुए इंस्पेक्टर के सामने हाथ जोड़कर पेश हुई। आंखों में आंसू लिए महिला ने इंस्पेक्टर से बताया साहब छह महीने से छुट्टी नहीं मिली, बेटे का बर्थडे है, घर जाना जरूरी है। केबिन में मीडियाकर्मियों को बैठा देखकर इंस्पेक्टर ने बेमन से उसकी छुट्टी स्वीकृत कर दी।छह महीने पूर्व पुलिस लाइन में तैनात सिपाही धर्मेद्र सिंह ने सहायक पुलिस अधीक्षक व प्रतिसार निरीक्षक प्रथम को पत्र लिखकर अपना दर्द बयां किया। उसने पत्र में लिखा कि छुट्टी पांच महीने से छुट्टी नहीं मिली, अब अगर छुट्टी नहीं मिलेगी तो पत्नी छोड़ देगी। पत्नी की इच्छा है कि कम से कम दस दिन अवकाश लेकर घर जाऊं। मामला अखबारों की सुर्खियां बना तब धर्मेद्र की छुट्टी स्वीकृत हुई।

इन घटनाओं से भी नहीं ले रहे सबक

  • इसी वर्ष रायबरेली के मुलिहामऊ निवासी दारोगा रामरतन वर्मा ने लाइसेंसी बंदूक से गोली मारकर आत्महत्या कर ली थी। रामरतन के घरवालों ने छुट्टी न मिलने के कारण आत्महत्या करने का आरोप लगाकर पुलिस विभाग की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिए थे।
  • मेरठ में तैनात वर्ष 2011 बैच के दारोगा अजीत सिंह ने छुट्टी न मिलने पर तत्कालीन एसएसपी मंजिल सैनी को इस्तीफा भेजा था। एएसपी राजेश साहनी की मौत का कारण भले स्पष्ट न हो सका हो, लेकिन छुट्टी के दिन उनके कार्यालय में मौजूद होने की स्थिति से आंकलन किया जा सकता है कि पुलिस किस कदर काम के दबाव में है।

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