विदेश में नौकरी के नाम पर मानव तस्करी

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विदेश में नौकरी के नाम पर मानव तस्करी


🗒 शनिवार, जुलाई 22 2017
🖋 विक्रम सिंह यादव, प्रधान संपादक

पीलीभीत

विदेश में नौकरी के नाम पर मानव तस्करी

शहर के मुहल्ला शेर मुहम्मद के राशिद तंगहाली से त्रस्त थे। इसी बीच एक व्यक्ति ने दुबई में नौकरी दिलवाने का झांसा दिया। लालच में फंसकर राशिद ने बहुत कुछ गंवाकर उसे मोटी रकम भी अदा कर दी। टूरिस्ट बीजा थमा दिया गया। दुबई पहुंचे तो वहां काम शुरू करने से पहले ही उनका पासपोर्ट जमा करवा लिया गया। 15 दिन बीतते ही बीजा की भी अवधि खत्म हो गई। अब वह तमाम यातनाएं सहते हुए बंधुआ मजदूर बनकर काम करने को विवश हो गए। बाद में किसी प्रकार उन्होंने परिजनों से संपर्क साधा और फिर विदेश मंत्रालय से तमाम कवायद के बाद वापस वतन आ सके। पूरनपुर का एक 50 वर्षीय व्यक्ति पासपोर्ट बनवाने के सिलसिले में अभिसूचना दफ्तर पहुंचा। वहां जब सवाल किया गया कि दुबई क्यों जाना चाहते हो तो उसने बताया कि किसी व्यक्ति ने वहां नौकरी दिलवाने को कहा है। डेढ़ लाख रुपये की मांग की है, जो अपना दो बीघा खेत बेचकर अदा कर देंगे। अभी टूरिस्ट बीजा दिलवाने को कहा है, जिसकी अवधि बाद में वह बढ़वा देगा। थाना सेहरामऊ उत्तरी के पांच लोग इसी कबूतरबाजी के चक्कर में जार्डन में फंसे हैं, जिसके लिए विदेश मंत्रालय ने प्रदेश के गृहमंत्री व पुलिस प्रमुख को मानव तस्करी की धाराओं में कार्रवाई के लिए लिखा है।

यह तीनों मामले तो नजीर मात्र हैं। तराई में विदेश में नौकरी दिलवाने के नाम पर मानव तस्करी का खेल खूब फल-फूल रहा है। दरअसल यहां के सिख समुदाय के लोग बड़ी संख्या में कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया, जार्डन व सोवियत रूस में रहकर व्यवसाय या नौकरी करते हैं। कुछ लोग बच्चों को पढ़ाई के लिए विदेश भेजते हैं, लेकिन अधिकांश सिख समुदाय के लोग अपने किसी परिचित के माध्यम से ही विदेश जाते हैं। विदेश जाने के बाद कुछ ही वर्षों में उनकी शानदार माली हालत देखकर तमाम लोग कम समय में मालदार बनने का सपना देखने लगते हैं। ऐसे लोग मानव तस्करी करने वाले कबूतरबाजों का आसान शिकार बन जाते हैं।

विदेश में नौकरी के लिए अलग बीजा होता है, जिसे हासिल करने के लिए उस विदेशी कंपनी का काल लेटर प्रस्तुत करना होता है। विदेश में नौकरी दिलवाने के लिए इमीग्रेशन एक्ट 1983 की धारा 10 के तहत कंपनी का भारत सरकार में पंजीकरण जरूरी होता है। वही कंपनी तय शर्तों के आधार पर संबंधित देश में नौकरी दिलवाने के लिए जिम्मेदार होती है। पीलीभीत में ऐसी कोई भी पंजीकृत कंपनी नहीं है। इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोगों को टूरिस्ट बीजा थमा कर भेज दिया जाता है और वहां बीजा की अवधि बीतते ही वह असहाय हो जाता है। फिर उसकी स्थिति बंधुआ की हो जाती है और बीजा अवधि बढ़वाने का आश्वासन देकर उससे अपने अपने तरीके से काम लिया जाता है। कई बार अमानवीय यातनाएं भी दी जाती हैं। यहां से जो भी व्यक्ति नौकरी दिलवाने का झांसा देकर विदेश भेजने का काम करता है वह सीधे-सीधे मानव तस्करी का अपराधी है।

मानव तस्करी के इसी खेल में फंसकर जार्डन पहुंचे कुर्रैया खुर्द कला के ज्ञानेन्द्र कुमार बाजपेयी ने किसी प्रकार वापस आकर जो दास्तान बताई, उसे सुनकर किसी का भी रूह फना हो जाएगा। उन्होंने बताया कि गुरुदीप ¨सह छह लोगों से दो-दो लाख रुपये लेकर टूरिस्ट बीजा पर जार्डन भेजा था। पहुंचने के बाद जहां काम मिला, वहां सबसे पहले पासपोर्ट जमा करवा लिया गया। इसके बाद बीजा अवधि बीतते ही अमानवीय यातनाएं दी जाने लगीं। एक बड़ी रोटी मिलती थी, जिसे तोड़कर सबको खाना रहता था। कई घंटे कठोर मेहनत के बाद भी अभद्र व्यवहार किया जाता था। उन्होंने वहां के कुछ वीडियो भी दिखलाए। किसी प्रकार वापस आने के बाद उन्होंने बाकी लोगों के परिजनों को वहां हाल बताया तो उन लोगों ने विदेश मंत्रालय से संपर्क साधा। विदेश मंत्रालय ने मई में प्रदेश के गृह मंत्री व पुलिस प्रमुख को पत्र भेजकर गुरुदीप ¨सह के खिलाफ इमीग्रेशन एक्ट की धारा 10 व 24 (मानव तस्करी) के तहत कार्रवाई को लिखा है।

अगर कोई भी व्यक्ति पासपोर्ट कहीं जमा होने की स्थिति में विदेश में फंसता है तो वह विदेश मंत्रालय से संपर्क कर आपातकालीन प्रमाण हासिल कर सकता है। सरकार उस व्यक्ति को वापस लाने की पूरी व्यवस्था भी करती है, लेकिन वापसी का पूरा खर्च देना पड़ता है।

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