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इलाहाबाद हाई कोर्ट में 28 जून से आड-इवन फार्मूला से सूचीबद्ध होंगे मुकदमे


🗒 रविवार, जून 27 2021
🖋 विक्रम सिंह यादव, प्रधान संपादक
इलाहाबाद हाई कोर्ट में 28 जून से आड-इवन फार्मूला से सूचीबद्ध होंगे मुकदमे

प्रयागराज,। इलाहाबाद हाई कोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश ने मुकदमों की लिस्टिंग में आड-इवन फार्मूले को लागू कर दिया है। सोमवार 28 जून से यह व्यवस्था प्रभावी होगी। सभी मुकदमे आड-इवन नंबर में लिस्ट होंगे। नए दाखिल केस एकल पीठ के समक्ष प्रतिदिन 100 और अतिरिक्त वाद सूची में 30 केस से अधिक नहीं लगेंगे। ऐसे ही खंडपीठ के समक्ष नए केस 60 और अतिरिक्त सूची में 20 केस ही लगेंगे। सभी केस, दाखिले की तारीख के अनुसार आड-इवन नंबर से लगेंगे। जहां बंच केसेस होंगे, वहां प्रथम लीडिंग केस के आड-इवन देखे जाएंगे। अगर कोई केस सात दिन के भीतर तय है तो उसे उसी जज की पीठ में लगाया जाएगा, जिसने तारीख तय की है। इस नियम के बावजूद कोर्ट अपने आदेश से किसी केस की तारीख तय कर सुनवाई कर सकेगी।इस व्यवस्था का विरोध शुरू हो गया है। कांस्टीट्यूशनल एंड सोशल रिफार्म के राष्ट्रीय अध्यक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता एएन त्रिपाठी का कहना है कि बार एसोसिएशन को विश्वास में लेकर ही सुनवाई प्रक्रिया तय कर न्याय देना उचित होगा। दाखिले की अवधि के अनुसार केस लगाए जाएं और कोर्ट निर्धारित अवधि तक बैठे। हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष राधाकांत ओझा का कहना है कि इस नियम से बार-बेंच का मधुर रिश्ता बेमानी हो गया है। बिना बार एसोसिएशन को विश्वास में लिए नित नये प्रयोग किए जा रहे हैं। हर चीफ जस्टिस नया प्रयोग करते हैं, यह उचित नहीं है। इधर हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष अमरेंद्रनाथ सिंह का कहना है कि मुकदमों की सुनवाई में आड-इवन फार्मूले का विरोध किया जाएगा। वकीलों को लिंक नहीं मिल रहा, महीनों पहले दाखिल मुकदमे कब सुने जाएंगे तय नहीं है। नया फार्मूला पहले से परेशान वकीलों की मुश्किल बढ़ाएगा।बार एसोसिएशन के पूर्व संयुक्त सचिव (प्रशासन) संतोष कुमार मिश्र कहते हैं कि हाई कोर्ट का रोस्टर भी कोरोना वेरिएंट की तरह रोज बदल रहा है। एक परेशानी खत्म होती है तो दूसरी शुरू हो जा रही है। एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष अनिल तिवारी का कहना है कि बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों व वरिष्ठ अधिवक्ताओं से परामर्श करके मुख्य न्यायाधीश को उचित निर्णय लेना चाहिए। यूपी बार काउंसिल के पूर्व सदस्य एसके गर्ग का कहना है कि हाई कोर्ट की पुरानी परंपरा रही है कि बार और बेंच के बीच मधुर रिश्ते बनाये रख वादकारी हित को सर्वोच्च रख न्याय प्रक्रिया चलायी जाय। परंपरा का लोप हो रहा है, जो सही नहीं है।

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