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भक्ति-शक्ति और बलिदान का प्रतीक है वसंत पंचमी, केवल उत्सव नहीं-रावत


🗒 मंगलवार, फरवरी 16 2021
🖋 विक्रम सिंह यादव, प्रधान संपादक
भक्ति-शक्ति और बलिदान का प्रतीक है वसंत पंचमी, केवल उत्सव नहीं-रावत

रायबरेली-आज बसंत पंचमी है। महराजगंज तहसील क्षेत्र में चारों ओर उत्सवनुमा माहौल है। जगह-जगह धार्मिक स्थलों पर मेले लगे हुए हैं। मेलों में भक्त और श्रद्धालुओं की भीड़ यह बयां कर रही है कि, हमारे लिए वसंत पंचमी कितना महत्वपूर्ण है। वसंत पंचमी केवल उत्सव नहीं है, यह भक्त शक्ति और बलिदान का प्रतीक भी है। इसी क्रम में क्षेत्र के मोन गांव स्थित महर्षि बाबा ओरी दास की तपोस्थली पर बसंत पंचमी से लगने वाले पांच दिवसीय मेले के प्रथम दिन अपार भीड़ देखने को मिली। यहां क्षेत्रीय विधायक राम नरेश रावत सपत्निक पहुंच कर सबसे पहले हवन यज्ञ किया, उसके बाद अनवरत चलने वाले भंडारे में अपने हाथों से भक्तों को प्रसाद वितरित किया आपको बता दें कि, इस मौके पर मौजूद क्षेत्रीय विधायक राम नरेश रावत ने बसंत पंचमी के महत्व को बताते हुए कहा कि, ऋतुराज बसंत, नाम लेते ही रोम-रोम पुलकित हो उठता है। मन को शीतल करती मंद-मंद हवा, गर्म रजाई-सी धूप, पेड़ों पर दिखाई देती नई-नई कोपलें। कभी फूलों पर बैठती तो कभी आसमान में दौड़ लगाती तितलियां, भंवरों का गुंजन और भी न जाने कैसे-कैसे दृश्य जो कामदेव की मादकता को भी नई ऊंचाईयां देते जान पड़ते हैं। मानो प्रकृति सब कुछ लुटा देने को व्याकुल हो उठती है। लेकिन बसंत में विस्मृति नहीं होनी चाहिए, उन अंधेरियों की जो सब कुछ उड़ा देने को व्याकुल थीं। उन्होंने कहा कि, उस चिलचिलाती धूप में जिसने चराचर जगत को झुलसने को मजबूर किया, उन घमंडी बिजलियों की जिसने समय-समय पर वज्राघात कर इसी धरती के सीने को छलनी किया। कफन की बर्फीली चादर की जिसने कभी शिराओं के रक्त को भी जमा दिया था। आज राष्ट्रजीवन में जब हम बसंत का अनुभव कर रहे हैं, तो उन आत्माओं का स्मरण करना भी बनता है, जिन्होंने इतिहास की षट ऋतुओं के आघात को सहा है श्री रावत ने इतिहास को स्मरण कराते हुए कहा कि, बसंत पंचमी केवल उत्सव का ही नहीं बल्कि भक्ति, शक्ति और बलिदान का प्रतीक भी है। जिनको शायद हमने इस दिन छतों पर बजने वाले डीजे की कानफोड़ आवाज में भुला-सा दिया है। इसी दिन माता शबरी ने अपने भगवान श्रीराम के अमृततुल्य जूठे बेरों का रसास्वाद किया, तो पृथ्वीराज चौहान व वीर हकीकत राय ने अपने जीवन का बलिदान दे कर आज के राष्ट्रजीवन में बसंत की नींव रखी। सद्गुरु राम सिंह जी का जन्म भी इसी दिन हुआ था, जिन्होंने गौरक्षा के लिए बलिदान की परंपरा को नई ऊंचाइयां दी बसंत पंचमी हमें त्रेता युग से जोड़ती है। रावण द्वारा सीता के हरण के बाद श्रीराम उसकी खोज में दक्षिण की ओर बढ़े। इसमें जिन स्थानों पर वे गये, उनमें दंडकारण्य भी था। वसंत पंचमी का दिन हमें पृथ्वीराज चौहान की भी याद दिलाता है। जिन्होंने विदेशी हमलावर मोहम्मद गौरी को 16 बार पराजित किया, और उदारता दिखाते हुए हर बार जीवित छोड़ दिया, किंतु जब सत्रहवीं बार वे पराजित हुए, तो मोहम्मद गौरी ने उन्हें नहीं छोड़ा। वह उन्हें अपने साथ अफगानिस्तान ले गया, और उनकी आंखें फोड़ दीं। गौरी ने मृत्युदंड देने से पूर्व उनके शब्दभेदी बाण का कमाल देखना चाहा। पृथ्वीराज के साथी कवि चंदबरदाई के परामर्श पर गौरी ने ऊंचे स्थान पर बैठकर तवे पर चोट मारकर संकेत किया। तभी चंदबरदाई ने पृथ्वीराज को संदेश दिया। "चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण। ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान।
सवांददाता अमरेन्द्र यादव

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