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कुप्रबंधित ETC प्रणाली ही बताती है टोल खत्म करने की जरूरत, बन रहीं यातायात में बाधक


🗒 रविवार, जुलाई 21 2019
🖋 विक्रम सिंह यादव, प्रधान संपादक

भारत सरकार टोल को जरूरी तो बता रही है, लेकिन साथ ही इस बात को भी स्वीकार कर रही है कि टोल संग्रह का मौजूदा तंत्र सही नहीं है और उसे दुरुस्त किए जाने की जरूरत है। टोल को खत्म करने और सड़कों के लिए धन संग्रह के वैकल्पिक उपाय अपनाने पक्ष में सरकार की ये स्वीकारोक्ति ही सबसे बड़ा तर्क है।हमारी सरकारों ने सड़क निर्माण के लिए धन जुटाने की खातिर यूजर चार्ज वसूलने के अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत को तो फटाफट स्वीकार कर लिया। किंतु इसके लिए जिस तरह की त्रुटिहीन टोल संग्रह प्रणाली की आवश्यकता थी, उसे लेकर कभी पूरी गंभीरता नहीं दिखाई। नतीजतन, हम एक ऐसी प्रणाली को ढो रहे हैं जो चाहे-अनचाहे सड़क उपयोगकर्ताओं को सुविधा देने और यातायात को सुगम बनाने के बजाय उनके आर्थिक व मानसिक उत्पीड़न के साथ-साथ यातायात को बाधित करने का माध्यम बन गई है।आज स्थिति ये है कि राष्ट्रीय राजमार्गो ही नहीं, स्टेट हाईवे और नगरीय सड़कों के अलावा पुलों तथा सुरंगों पर भी टोल वसूला जा रहा है। कहने को देश में नेशनल इलेक्ट्रानिक टोल कलेक्शन (एनईटीसी) प्रोग्राम चल रहा है। लेकिन इसमें राष्ट्रीय राजमार्गो के अलावा किसी अन्य सड़क को शामिल नहीं किया गया है। स्टेट हाईवे व नगरीय सड़कों पर अभी भी बैरियर लगाकर पुराने लट्ठमार तरीकों से टोल की उगाही की जा रही है।जहां विदेशों में हाईवे और एक्सप्रेसवे पर लेन ड्राइविंग के साथ सभी लेनों पर इलेक्ट्रानिक टोलिंग लागू होती है। वहीं भारत में अभी भी एनएचएआइ के पौने चार सौ टोल प्लाजाओं में से ज्यादातर पर केवल इसके लिए एक लेन निर्धारित है। उसमें भी बिना फास्टैग वाले वाहन घुस जाते हैं जिससे फास्टैग वाले वाहनों का निर्बाध मूवमेंट बाधित होता है। हालांकि इस समस्या पर हाल ही में सरकार का ध्यान गया है और उसने दिसंबर से सभी लेनो को फास्टैग लेन में बदलने का एलान किया है। इसके बावजूद इस बात का भरोसा नहीं है कि एनएचएआइ दिसंबर तक ऐसा कर पाएगी। यही वजह है कि सरकार ने लगे हाथ इस बात की घोषणा भी कर दी है कि फास्टैग लेन में घुसने वाले वाहनों से दंडस्वरूप जुर्माना वसूला जाएगा।

कुप्रबंधित ETC प्रणाली ही बताती है टोल खत्म करने की जरूरत, बन रहीं यातायात में बाधक

देश में इलेक्ट्रानिक टोल प्रणाली लागू हुए पांच वर्ष से अधिक हो चुके हैं। इसके बावजूद अभी तक आरएफआइडी फास्टैग की तकनीकी त्रुटियों को पूरी तरह दूर नहीं किया जा सका है। एक तो फास्टैग मिलने में 8-10 दिन लग जाते हैं। दूसरे कभी-कभी इसमंे जरूरत से ज्यादा राशि कट जाती है, जो आसानी से वापस नहीं मिलती। यही वजह है कि ज्यादातर वाहन चालक अभी भी फास्टैग लेने से बचते हैं। सरकार इस तथ्य से भलीभांति परिचित है। तभी तो उसने एनएचएआइ से फास्टैग की खामियों को दूर करने तथा सभी वाहन चालकों को उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए फास्टैग की आवश्यकता का आकलन करने को कहा है।तमाम प्रयासों के बावजूद अगस्त, 2018 तक देश भर में कुल 27 लाख फास्टैग ही इश्यू हो पाए थे। जिससे ईटीसी के जरिए महज 20-21 फीसद टोल संग्रह हो पा रहा है। जबकि सरकार ने 2020 तक पचास फीसद टोल ईटीसी से संग्रहीत करने का लक्ष्य रखा है। ये तब है जबकि मार्च, 2018 से ही सभी नवनिर्मित वाहनों फास्टैग लगाना अनिवार्य किया जा चुका है तथा कियास्क के अलावा ऑनलाइन और मोबाइल एप्लीकेशन के जरिए भी फास्टैग की बिक्री के इंतजाम किए गए हैं।टोल तंत्र की खामियों का नुकसान मोटर चालकों, ट्रांसपोर्टरों ही नहीं, देश के सभी नागरिकों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उठाना पड़ रहा है। अनियोजित व कुप्रबंधित टोल प्लाजाओं पर जाम और गति अवरोध के कारण वाहनों से निकलने वाले जहरीले उत्सर्जन की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे आसपास का पर्यावरण खराब होने से मनुष्यों के साथ अन्य जीवों के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है।सेंटर फार साइंस एन्वायरनमेंट (सीएसई) के अध्ययन से पता चला है कि वाहनों की औसत रफ्तार में 3 किमी प्रति घंटे की कमी आने पर नाइट्रोजन ऑक्साइड गैस का उत्सर्जन 38 फीसद बढ़ जाता है। जबकि आइआइटी, मद्रास के अध्ययन से मालूम हुआ है कि यातायात अवरोध के कारण अकेले दिल्ली में समय, स्वास्थ्य और ईधन की बर्बादी से सालाना 61 हजार करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान होता है।

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