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कलश स्थापना के साथ वासंतिक नवरात्र 25 मार्च से शुरू


🗒 मंगलवार, मार्च 24 2020
🖋 विक्रम सिंह यादव, प्रधान संपादक

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को कलश स्थापना के साथ ही 25 मार्च से वासंतिक नवरात्र शुरू हो जाएगा। दो अप्रैल तक पूरे नौ दिनों की नवरात्र होगी। एक अप्रैल को अष्टमी पूजन और हवन होगा। दो अप्रैल रात्रि के 8:47 बजे तक नवमी का मान रहेगा। ऐसे में पूरे नव दिन का व्रत रखने वाले श्रद्धालु इस दिन व्रत का पारण कर सकते हैं।25 से शरू होने वासंतिक नवरात्र के साथ ही भारतीस नव वर्ष भ्री शुरू होगा। कोरोना के चलते दो अप्रैल तक राजधानी के मुख्य दुर्गा मंदिरों में कोई आयोजन नही होंगे। भारतीय नव वर्ष का स्वागत भी सादगी से होगा। घर में ही कलश स्थापना कर पूजन करना चाहिए। ज्योतिष शास्त्र में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को वर्ष प्रतिपदा कहा गया है। यह भारतीय कालगणना का प्रथम दिन है। इसी दिन से भारतीय विक्रमी नववर्ष की शुरुआत होती हैइस बार 25 मार्च 2020 से विक्रमी संवत-2077 प्रारंभ हो रहा है। इसे 'प्रमादी' संवत्सर के नाम से जाना जाएगा। नए संवत्सर का राजा बुध और मंत्री चंद्रमा रहेगा। आचार्य एसएस नागपाल ने बताया कि देश  में कालगणना की अनेक विधियां प्रचलन में रही हैं। इनमें चंद्र गणना पर आधारित पद्धति प्रमुख है। विक्रमी संवत की गणना भी इसी आधार पर की जाती है। इसमें चंद्रमा की 16 कलाओं के आधार पर दो पक्ष (शुक्ल व कृष्ण) का एक मास होता है। कृष्ण प्रतिपदा से पूर्णिमा तक प्रत्येक चंद्रमास में साढ़े 29 दिन होते हैं। इस प्रकार एक वर्ष 354 दिन का हुआ। पृथ्वी को सूर्य के परिभ्रमण में 365 दिन व छह घंटे लगते हैं। सो, प्रत्येक वर्ष 11 दिन तीन घड़ी और लगभग 48 पल का अंतर पड़ जाता है। यह अंतर तीन वषों में बढ़ते-बढ़ते लगभग एक मास का हो जाता है। इन शेष दिनों के समायोजन और कालगणना का अंतर पाटने के लिए तीन वर्ष में एक अधिमास की व्यवस्था है। प्रत्येक तीसरे वर्ष चंद्रमासों में एक मास की वृद्धि हो जाती है, जिसे अधिमास, मलमास अधिकमास या पुरुषोत्तम मास कहते हैं। चंद्रमास के अनुसार यह 13वां मास हो जाता है। यह वर्ष भी 12 नहीं, 13 माह का होगा।आचार्य अनुज पांडेय ने बताया कि इस बार आश्विन का अधिकमास रहेगा, जो 17 सितंबर 2020 से 16 अक्टूबर 2020 तक रहेगा। विक्रमी संवत में सूर्य और चंद्रमा, दोनों की गति का ध्यान रखा जाता है। इसलिए यह सौर संवत्सर भी है और चंद्र संवत्सर भी। चंद्रवर्ष का सौर वर्ष से मेल-मिलाप ठीक रखने के लिए ही शुद्ध वैज्ञानिक आधार पर प्रत्येक तीन वर्ष बाद एक माह या अधिकमास की अतिरिक्त व्यवस्था की गई है। बीच-बीच में नक्षत्रों की स्थिति के अनुरूप तिथियों की घटत-बढ़त की जाती है।25 मार्च बुधवार को सूर्योदय के दो घंटे पूर्व से लेकर सुबह 10 बजे तक रेवती नक्षत्र में कलश स्थापन की जा सकती है। आचाय्र राकेश पांडेय ने बताया कि सूर्योदय से लेकर दोपहर 3:50 बजे तक कलश स्थापना करने योग है। सुबह 11:35 से 12:23 तक अभिजीत मुहूर्त है। इस समय कलश स्थापना के साथ ही मां भगवती का ध्यान करने से विशेष लाभ होगा।कोरोना की सर्तकता के चलते आप घर में ही विधि-विधान से मां की आराधना कर सकते हैं। दुर्गा सप्तशती का पाठ आपके साथ ही आपके घर को भी पवित्र बनाएगा। आचार्य शक्तिधर त्रिपाठी के मुताबिक, हर अध्याय आपके जीवन के लिए खास होता है। 

कलश स्थापना के साथ वासंतिक नवरात्र 25 मार्च से शुरू

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