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शहीद भगत सिंह ने किया था कड़ा संघर्ष


🗒 सोमवार, सितंबर 28 2015
🖋 राम निवास यादव, वृन्दाबन संवाददाता मथुरा

आगरा: देश की आजादी के लिए शहीद-ए-भगत सिंह ने दिल्ली असेंबली में बम धमाका करने के लिए आगरा के नूरी दरवाजा इलाके में प्लान बनाया जहां उन्होंने बम बनाया था। इसके बाद उन्होंने दिल्ली असेंबली में बम धमाका किया जिस कारण अंग्रेजी सरकार पूरी तरह से हिल गई थी। जिस घर में उन्होंने बम की फैक्ट्री लगाई थी उसकी आज हालत इतनी खस्ता हो चुकी है कि वो इमारत कभी भी गिर सकती है। यह भगत सिंह के क्रांंतिकारी कदम की एकमात्र निशानी है जिसकी मुरम्मत नहीं हुई है। 

शहीद भगत सिंह ने किया था कड़ा संघर्ष

 
इस बिल्डिंग का ऊपर का भाग तो खाली है, लेकिन निचले भाग पर आज भी 12 दुकानें हैं जहां मोबाइल रिचार्ज और पेठे की दुकान होने के कारण यहां पर लोग अक्सर आते जाते रहते हैं। इस कोठी की छत, ऊपरी की तरफ बनी दीवारों और छज्जों में दरारें साफ दिखाई देती हैं। आजादी के बाद सरकार ने इसका नाम नूरी दरवाजे से बदल कर शहीद भगत सिंह द्वार कर दिया था, लेकिन ये नाम सिर्फ कागजों में ही सिमट कर गया। आज भी ये जगह नूरी दरवाजे के नाम से ही जानी जाती है।
 
लिया था किराए पर कमरा 
एक इतिहासकार राज किशोर के अनुसार भगत सिंह नवंबर 1928 में लाला छन्‍नोमल के मकान (नंबर-1784) पर किराए पर रहने लगे और उनके साथ कई दोस्‍त भी थे। वह यहां स्टूडेंट बनकर रहे और इसके लिए उन्‍होंने आगरा कॉलेज में दाखिला भी लिया था।
 
यहां होती थी बम की टेस्टिंग 
राजे बताते हैं कि यहां बनने वाले बम की टेस्टिंग नालबंद नाला या नूरी दरवाजा के पीछे जंगल में होती थी। क्रांतिकारियों कुछ सदस्‍य नाई की मंडी में भी रुकते थे। यहां बम और हथियार छिपाकर रखे जाते थे। भगत सिंह से जुड़े दस्तावेजों के मुताबिक, अंग्रेजों ने ट्रेड्स डिस्‍प्यूट्स बिल को दिल्‍ली स्थित असेंबली में पेश किया था। भगत सिंह और अन्‍य क्रांतिकारियों ने इसी मकान में मीटिंग कर असेंबली में बम फेंकने की तैयारी की। उन्‍होंने इस काम में साथी के रूप में एक अन्‍य युवक को भी चुना। इसमें राजगुरु का नाम नहीं था। हालांकि, राजगुरु के दबाव में उन्‍हें भी साथ ले जाना पड़ा था।
 
कब हुआ जन्म 
बताते चलें कि सरदार भगत सिंह का नाम अमर शहीदों में सबसे प्रमुख रूप से लिया जाता है। उनका जन्म 27 सितंबर 1907 को पंजाब के जिला लायलपुर में बंगा गांव (जो अभी पाकिस्तान में है) के एक देशभक्त सिख परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और मां का नाम विद्यावती कौर था।
 
आजादी के लिए दी कुर्बानी 
साल 1923 में इंटरमीडिएट की परीक्षा पास करने के बाद उन्हें विवाह बंधन में बांधने की तैयारियां होने लगी, तो वो लाहौर से भागकर कानपुर आ गए। फिर देश की आजादी के संघर्ष में ऐसे रम गए कि पूरा जीवन ही समर्पित कर दिया। भगत सिंह ने देश की आजादी के लिए जिस साहस के साथ शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार का मुकाबला किया, वो युवाओं को आज भी प्रेरित करता है।
 
सरकार नहीं देती ध्यान 
कोठी के सामने आज भी एक पुरानी पेठे की दुकान है। उसके मालिक राजेश अग्रवाल के मुताबिक, आज तक किसी सरकार और प्रशासनिक अधिकारी ने इस मकान को संरक्षित करने या जीर्णोद्धार करने की पहल नहीं की है। इस क्षेत्र में सालों से मजदूरी करने वाले राम सुरेश कहते हैं कि यहां साल में दो बार चूना डाला जाता है। चौराहे पर लगी मूर्ति पर लोग फूलमाला चढ़ाते हैं। शहीद भगत सिंह जिंदाबाद ने नारे लगते हैं और कुछ एक दिन बाद सब भूल जाते हैं। आज तक किसी ने भी यहां जमीनी स्तर पर कुछ नहीं किया है।

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