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संस्कृत के वैभव से ही दुनिया का नेतृत्व करेगा भारत: सीएम योगी आदित्‍यनाथ


🗒 रविवार, अक्टूबर 28 2018
🖋 विक्रम सिंह यादव, प्रधान संपादक

 मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संस्‍कृत भारती की ओर से आयोजित समारेाह में कहा कि हमने संस्कृत को पुरोहित कार्य तक सीमित कद दिया है। ज्ञान-विज्ञान की जो विस्तृत परंपरा थी आध्यात्म की ऊंचाइयों पर, जो विज्ञान की सीमाओं का भी अतिक्रमण कर सकती थी उनको प्राप्त करने का जो भाव होना चाहिए था हमने खोया है। 

संस्कृत के वैभव से ही दुनिया का नेतृत्व करेगा भारत: सीएम योगी आदित्‍यनाथ

निवेदिता शिक्षा सदन में आयोजित समारोह में सीएम ने कहा कि मुझे लगता है जिस दिन संस्कृत अपने पूर्ण वैभव को पुन: प्राप्त करेगी, भारत हर क्षेत्र में दुनिया का नेतृत्वकर्ता के रूप में एक बार पुन: स्थापित होगा। इसमें कोई संदेश नहीं। लक्षण अभी से दिखाई दे रही है। दुनिया को योग के बारे में जानकारी न केवल मिली बल्कि योग को समझना पड़ा। दुनिया 21 जून को विश्व योग दिवस मना रही है। दुनिया ने योग को स्वीकार किया। 192 देश योग के साथ आत्मसात करते दिखाई देते हैं। विलक्षण क्षण होता है हम सबके सामने। कुंभ का आयोजन हजारों वर्षों से हो रहा है। पहली बार भारत के कुंभ की परंपरा को अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता मिल सके, इसका कार्य भी पहली बार हो रहा है। 2019 में कुंभ के भव्य आयोजन की दृष्टि से तैयारी कर रहे हैं। कुंभ का आयोजन केवल प्रयागराज का ही आयोजन न बनकर रह जाए या केवल उप्र का आयोजन न बन जाए, उत्तर भारत का आयोजन न बन जाए, इसलिए दृष्टि से हम लोगों ने देश के 6 लाख गांवों को आमंत्रण भेजा है कि आप भी इस आयोजन में भागीदार बनें। कुंभ का आयोजन मानवता का आयोजन बन सके इस दृष्टि से दुनिया के 192 देशों को हम आमंत्रित कर रहे हैं। 

हमने किसी को खांचों में बांटकर नहीं देखा है। हमने कभी नहीं ये नहीं कहा कि मेरी काशी है तो इस काशी में केवल मैं ही पूजा कर सकता हूं, दूसरा कोई नहीं आ सकता। काशी तो काशी है। जो काशी में आए वो यहीं का होकर रह गया। काशी में भगवान शंकर आए, रामानंदाचार्य भी आए और रविदास भी आए। सब यहीं के होकर रह गए। यहां से उन्होंने ज्ञान का जो प्रकाश दिया, पूरी दुनिया उससे आलोकित हुई। उससे प्रेरणा प्राप्त की। उस प्रेरणा से उन्होंने समाज का मार्गदर्शन किया समाज को एक नई दिशा दी। और वहीं स्थिति भारत के साथ भी होती है। जो भारत में आया वह भारत का होकर रह गया। कहीं न कहीं बीच के कालखंड में हमने उनका भारतीयकरण करने की उस विधा को कमजोर किया। अन्यथा सातवीं-आठवीं शताब्दी के पहले जो भी भारत में आया, जिस भी रूप में आया सबका भारतीयकरण हुआ। सभी भारत की परंपरा के साथ ऐसे रच बस गए कि आज उनको पहचानना कठिन हो जाता है। पहचान ही नहीं सकते। कुंभ का यह आयोजन हम सबके सामने होगा, जब 2019 में हम लोग इस आयोजन को एक साथ बिना आमंत्रण के 12 से 15 करोड़ श्रद्धालु स्वत: स्फूर्त भाव से प्रयागराज की धरती पर कैसे आते हैं ये विलक्ष्ण आध्यात्मिक अवसर होगा। इस अवसर का लाभ लेने के लिए यदि पूरी दुनिया की मानवता को अगर हम प्रयागराज की धरती पर आमंत्रित करते हैं तो यह और भी हम सब के लिए शुभ अवसर होगा देश के लिए उप्र के लिए और खुद प्रयागराज के लिए। और वहीं स्थिति संस्कृति की भी है। संस्कृति को भी हमें इसके प्रचार-प्रसार में योगदान में सहयोग करना चाहिए। दुनिया में ज्ञान-विज्ञान की अनेक भाषाएं होंगी, लेकिन अगर विज्ञान की सीमाओं का अतिक्रमण कर आध्यात्म की धरती पर प्रवेश करना है तो संस्कृत उसका एकमात्र माध्यम होगा। और संस्कृत के प्रचार-प्रचार के लिए भारत के कल्याण का मार्ग पहले प्रशस्त करने की जरूरत है। वह संस्कृत के माध्यम से ही होगा। वास्तव में संस्कृत भारत की भाषा है। यह देववाणी है। हमारा कोई मंत्र या स्त्रोत बिन संस्कृत के पूरा नहीं होता।

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