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वाराणसी में 15 टन थाई मांगुर के बच्चे बरामद, ड्राइवर सहित तीन तस्कर गिरफ्तार


🗒 मंगलवार, जनवरी 12 2021
🖋 विक्रम सिंह यादव, प्रधान संपादक
वाराणसी में 15 टन थाई मांगुर के बच्चे बरामद, ड्राइवर सहित तीन तस्कर गिरफ्तार

वाराणसी, लंका थाना क्षेत्र के डाफी टोलप्लाज़ा से  मुखबिर की सूचना पर मंगलवार की शाम इंस्पेक्टर लंका महेश पांडेय के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल से हापुड़ जा रही एक ट्रक थाई मांगुर के बच्चे चालक सहित दो तस्कर को गिरफ्तार किया गया। सूचना पर पहुंची मतस्य विभाग की टीम ने प्रतिबंधित मांगुर के रूप में पहचान की।मत्स्य विभाग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रविन्द्र प्रसाद ने बताया कि 15 टन मछली के बच्चों को फिनायल और केमिकल डालकर जेसीबी से किये गड्ढे में पुलिस और राजस्व विभाग की उपस्थिति में नष्ट कराया गया।पुलिस गिरफ्तार तस्करों से पूछताछ में जुटी हैं कि इसके पहले कितनी प्रतिबंधित मछली की खेप पहुंचाई जा चुकी है। इंस्पेक्टर लंका ने बताया कि तस्करों ने बताया कि पश्चिम बंगाल से हापुड़ ले जा रहे थे।पकड़े गए तस्कर पश्चिम बंगाल के ही रहने वाले दीप चंद पात्र , सपन तथा पंजाब निवासी ट्रक चालक रेशम सिंह हैं।तस्करों ने पुलिस को बताया कि हापुड़ सहित उसके अगल बगल के जिलों में अच्छा रेट मिल जाता है।थाना लंका क्षेत्र रमना में प्रतिबंधित थाई मांगुर के साथ अभियुक्त रामबालक साहनी, गुरुचरण सिंह, संतोष यादव को लंका पुलिस ने गिरफ्तार करके जेल भेजा था।पुलिस जांच में ये सभी मुख्तार अंसारी गैंग के आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाने में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से सहयोगी थे। जांच में सामने आया था कि ये गैंग बनाकर मांगुर मछली के  व्यापार के माध्यम से माफिया मुख्तार अंसारी के गुर्गों को आर्थिक लाभ देते थे।मत्स्य विभाग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रविन्द्र प्रसाद के अनुसार, थाई मांगुर मछली मांसाहारी होती है। इस मछली की खासियत यह है कि जिस नदी या तालाब में रहती है वहां के पानी में पलने वाले अन्य जीवों को खा जाती हैं और पानी की वनस्पतियों को भी नष्ट कर देती है। मनुष्य के सेहत के लिए यह मछली स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक होती है। इसके कारण लिवर, स्कीन, किडनी और कैंसर जैसी बीमारियां होने का खतरा रहता है। भारत सरकार ने वर्ष 2000 में इसको प्रतिबंधित किया था। इसको पालना और बेचना प्रतिबंधित है।मत्स्य विभाग के अधिकारी रविन्द्र प्रसाद के अनुसार थाई मांगुर के बच्चे अभी 100 ग्राम के ही थे जिनकी संख्या इतनी ज्यादा थी कि उसे सैकड़ों तालाबो में छोड़ा जाता तो देसी मछलियों को भी नुकसान होता। इसे कम कम 300 रुपये किलो बेचा जाता जिसकी कीमत 40 लाख से ज्यादा की थी।

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